कविता

वो गांव की लड़की

वो गांव से शहर आयी
बड़ी मिन्नत और जीत से आयी
बड़े मकान ,छोटा सा कमरा
उस कमरे के कोने में
अपनी जगह बनायी

वो गांव से शहर आयी
वो गांव की लड़की
चित्र भी बनाती
लोकगीत भी गुनगुनाती
जब बीच चौराहे सब चाय पीने को जाते
वो बालकनी से सब निहारती

वो गांव से शहर आयी
जब खाने को सब मिलता
तव नखरे बहुत थे,
यहाँ तो नखरे और मिजाज
किसी को पता ही नहीं
यहाँ तो बस राजा और रिआया
कहीं धुप कही छाया।

वो शहर की लड़की
वो गांव से शहर आयी
प्यास लगे तो शहर ही पीया
भूख लगे तो शहर ही खाया
लेकिन सबने मुझसे ज्यादा
मेरे पैसे को ही पहचाना
तब मन में विचार आया
मै गांव से शहर क्यू आयी??

— सुजाता मिश्रा

सुजाता मिश्रा

मकान न-320 पाटलीपुत्र कॉलोनी पटना -800013 चलभाष-9934245206

Leave a Reply