कविता

सादगी, बचत और संस्कार वाली पीढ़ी

सैंतालीस से सड़सठ के बीच जन्मे,वो पीढ़ी कहलाए,
कम साधन में भी मुस्काकर,जीवन के दीप जलाए।
बच्चों! जब ये चले जाएँ,ये बातें याद सँभालना,
चीज़ों को फेंकने से पहले,उन्हें सुधारना-पालना।

फटी हुई छतरी को सिलवाकर,बरसातों में चलना सीखा,
सवेरे दातुन करते-करते,गलियों में टहलना सीखा।
पेस्ट की ट्यूब को दबाकर,आखिरी बूंद भी बचाते थे,
थोड़े में संतोष रखकर,बड़े सुखों को अपनाते थे।

फटे पजामे,कुर्ते,पैंट और शर्ट को सिलकर पहनते थे,
कपड़ों की उम्र बढ़ाकर,श्रम का मान रखते थे।
जूते फटते तो मोची के पास,उन्हें फिर से जुड़वाते थे,
नई चीज़ खरीदने से पहले,पुरानी को बचाते थे।

टूटी कुर्सी,बिखरी चारपाई,रस्सी से फिर बाँधते थे,
खाली डिब्बे,बोतल,थैले,काम में फिर लाते थे।
रोटी का एक कण भी व्यर्थ,कभी गिरने न देते थे,
मेहनत,बचत और ईमानदारी से,घर-आँगन भर देते थे।

वस्तुओं को नहीं,उनके पीछे लगी मेहनत को संभाला
नई पीढ़ी यह सीख ले,तो भविष्य भी संस्कारों से उजाला
किशन पुरानें में हीं,मेहनत की पहचान है,
सादगी,बचत और संस्कार ही,हमारी पीढ़ी की शान है।

— किशन सनमुखदास भावनानी

*किशन भावनानी

कर विशेषज्ञ एड., गोंदिया

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