कविता – माँ और पापा-जीवन के दो अनमोल स्तंभ
माँ के बिना घर की हर दीवार बिखर जाती है,पापा के बिना तो पूरी दुनिययाँ ही उजड़ जाती है।माँ की
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Read Moreजिस हाथ को पकड़कर उसने दुनियाँ में चलना सीखाउसी हाथ से पड़े थप्पड़ ने रिश्तों से डरना सीखा,वह चुप हो
Read Moreवैश्विक स्तरपर भारत की हजारों वर्षों पुरानी सभ्यता में माता-पिता,गुरु और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता को केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं,बल्कि
Read Moreजिस घर में नारी का सम्मान होता है,वहीं प्रेम का पावन स्थान होता है।जहाँ उसकी मुस्कान बनी रहे सदा,वहीं सुख-समृद्धि
Read Moreदुआ वो दौलत है,जिसके आगे ताज भी झुक जाता है,जिसके लिए अमीर भी हाथ उठाकर माँगता है।बद्दुआ वो आग है,जो
Read Moreजो योग्य नहीं,उसे भी सम्मान दिया करो,अपने संस्कारों का सदा मान रखा करो,दूसरों की कमी से अपना स्तर मत गिराओ,अपने
Read Moreवैश्विक स्तरपर इक्कीसवीं सदी का डिजिटल युग सूचनाओं की अभूतपूर्व शक्ति लेकर आया है।इंटरनेट सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स ने
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Read Moreऐ मेरे मन,पापों और गुनाहों से अब तौबा कर लो,अंतर की मैली गलियों को पश्चाताप से धो लो।आज सँभल जाओ,कल
Read Moreवक्त ख़ुद तो कभी दिखाई नहीं देता,मगर हाँ,वक्त सब कुछ दिखा देता।कौन अपना है,कौन पराया,ये समझा देता,चेहरों के पीछे छिपा
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