दोहे मन क़ो मोहे
मन में भरकर प्रीत तुम,कैसे रखते धीर ?
सुन ओ मेरे रांझिया,व्याकुल तेरी हीर ।।
श्वास श्वास में तुम बसे,तुम ही नयन समाय।
मुझको तुम्हरे नाम से,अब सब लोग बुलांय ।।
मान लिया अब आज से, मैंने तुझको मीत.
आगे आगे तू चले,पीछे तेरी प्रीत।।
लगते इतने गूढ़ वो ,जैसे कोई वेद,
समझेंगे कैसे भला, कहो नयन के भेद।।
बिखरी-बिखरी सी लटें,नहीं करें श्रृंगार,
कोमल कंचन कामिनी, करें न कैसे प्यार।
नैन मिले जो नैन से,झट हो जाती ओट।
हाय!!न रामा सोच लें,क्या हिय उनके खोट।।
कहने होंगे अब हमें,कुछ मन के उदगार ।
हृदय उपासक आपका,दिल बेबस लाचार।
प्रणय निवेदन कर रहे,कर लीजे स्वीकार।
आज अभी से कर लिया, तुमको अंगीकार।।
— सविता सिंह मीरा
