कविता

अन्तस्थ की क‌लम

तुमने सिर्फ मेरे किरदार पढ़े होंगे,
भावों के वेग उमड़ते देखे होंगे।
मेरे अन्तस्थ की कलम देखी होती,
तो शायद मेरा रंगीन सफ़र लिखते।।

तुमने सिर्फ मेरे रिश्ते गिने होंगे,
कभी रिश्तों के भंवर परखे होंगे।
मेरे अन्तस्थ की स्याही देखी होती,
तो तुम एक युग का निर्माण करते।।

तुमने सिर्फ मेरे नारी चरित्र पढ़ें होंगे,
कर्म और धर्म के रेखा चित्र देखे होंगे।
मेरे उलझे पन्नों की साख देखी होती,
तो शायद पांचवें वेद युग पर्वतन लिखते।।

तुमने मेरे बसन्त के किनारे देखे होंगे,
कभी पतझड़ के बेरूखे पत्ते देखे होंगे।
ग्रीष्म की कलियों की नमी देखी होती,
तो शायद ऋतुओं का चहुमुखी श्रृंगार लिखते।।

— सन्तोषी किमोठी वशिष्ठ “सहजा”

सन्तोषी किमोठी वशिष्ठ

स्नातकोत्तर (हिन्दी)

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