दर्पण
दर्पण में
क्या देख सकता है बिंब?
केवल प्रतिबिंब,
उसे क्या लेना-देना?
वह तो दिखाता है
जैसा हो वैसा,
वह न तो है
चेहरों का संग्रहालय
कि न तो है
आंसू का रुग्णालय,
वह कभी नहीं दिखाता है
कायर की भांति पीठ,
वह तो प्रहार करता है जानलेवा
सीने के सामने।
— पुष्करराय जोषी
