Author: पुष्करराय जोषी

कविता

उलझनें

जहां जहां डालो नज़र,वहां उलझनें, उलझनें, उलझनें,बिना उलझनकैसा लगेगा जीवन?हम क्यों बनाये जीवन को रेगिस्तान?उलझनों से जीवन बनेगा गुलिस्तान,उलझनोको स्वीकारो,और

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