उलझनें
जहां जहां डालो नज़र,वहां उलझनें, उलझनें, उलझनें,बिना उलझनकैसा लगेगा जीवन?हम क्यों बनाये जीवन को रेगिस्तान?उलझनों से जीवन बनेगा गुलिस्तान,उलझनोको स्वीकारो,और
Read Moreखतरनाक खेल खेला जा रहा हैमानव मानों कठपुतली हो गये हैं,औरत का रुतबा बाहर से भव्य है,किंतु मादा से ज्यादा
Read Moreसफेद कागज मेंकलम से शब्द की ज्योति जलाकरकवि ढूंढ़ता है पतासत्य के सूरज का। कूच सत्य की लाठी के सहारेआज
Read Moreसूरज होते भीचारों ओर है घोर अंधेरा,रात के वक्त रोशनी में भी अंधेरा !खंडहर से दिलऔर रेगिस्तान से चित्त में
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