कागज़
कागज़
कभी लगता है घना जंगल,
किंतु क़लम लेते ही
बन जाता है
दहकता रेगिस्तान,
कभी लगता है असीम समंदर,
तो कभी बन जाता है बवंडर,
कभी क्रीड़ांगन
तो कभी कुरूक्षेत्र,
बहुधा लगता है
जिंदगी के रंगमंच सा
जो नचाता है हमें उम्रभर
कठपुतली बनाकर।
— पुष्करराय जोषी
