गीत/नवगीत

नारी नर पर भारी है

नारी नर पर भारी है,
फिर भी वह बेचारी है।

आँसू का हथियार चलाती,
सबको अपना दास बनाती,
पलभर में घुटनों पर लाती,
फिर भी कितनी प्यारी है।

नारी नर पर भारी है
फिर भी वह बेचारी है।

पिता पति हो या बेटा भाई,
सबने ही मिल राह दिखाई,
कदम कदम पर दिया सहारा,
फिर भी नर अत्याचारी है।

नारी नर पर भारी है
फिर भी वह बेचारी है।

कानून खड़े हैं उसके हक में,
सामाजिक ताने भी अपने,
अन्जाने भी दिखलाते सपने,
उसके संग हमदर्दी सारी है।

नारी नर पर भारी है
फिर भी वह बेचारी है।

कोई रोके न कोई टोके,
देर रात तक घर को लौटे,
उन्मुक्त जीवन ही आजादी,
आधुनिकता की बिमारी है।

नारी नर पर भारी है
फिर भी वह बेचारी है।

घर पर चाह अकेली हो,
अपनी अलग हवेली हो,
सास ससुर लगते दुश्मन से,
उनको रखना लाचारी है।

नारी नर पर भारी है
फिर भी वह बेचारी है।

वृद्धाश्रम भेज रही है,
धन दौलत समेट रही है,
पति पले गुलाम के जैसा,
कुछ बोले मुश्किल भारी है।

नारी नर पर भारी है
फिर भी वह बेचारी है।

किट्टी कल्ब हैं उसके शौंक,
सिगरेट दारू की भी धौंक,
पुरूष दोस्त हैं उसके सारे,
बस पति लगे बिमारी है।

नारी नर पर भारी है
फिर भी वह बेचारी है।

रूप अदा से करे दिवाना,
बातों से गैरों को फुसलाना,
खेल सदा से उसका देखा,
अधिकार मिले सरकारी है।

नारी नर पर भारी है
फिर भी वह बेचारी है।

दहेज का हथियार मिला है,
आँसू पका उपहार मिला है,
कत्ल कर सकती नयनों से,
अधिकार निरन्तर जारी है।

नारी नर पर भारी है
फिर भी वह बेचारी है।

सदा खड़ी वह नर से आगे,
नर लगते संग खड़े अभागे,
सब कुछ सहते हंस हंस कर,
नर की कैसी लाचारी है,।

नारी नर पर भारी है
फिर भी वह बेचारी है।

समानता की बात बताती,
पर हरदम आरक्षण पाती,
मातृत्व को भी बिसराती अब,
भ्रूण की वह हत्यारी है।

नारी नर पर भारी है
फिर भी वह बेचारी है।

आधुनिकता की दौड़ हो रही,
सम्पूर्ण जगत से होड़ हो रही,
नग्नता बनी है मापक,
कैसी यह लाचारी है।

नारी नर पर भारी है
फिर भी वह बेचारी है।

नारी बन गई है विज्ञापन,
विज्ञापन से जीवन यापन,
मौज मस्ती की आजादी हो,
उसकी आजादी जारी है।

नारी नर पर भारी है
फिर भी वह बेचारी है।

चीर का बंधन मर्यादा हमारी है,
बंधन के बंध टूटे विपदा भारी है,
नारी और नीर की गति एकसारी है,
बंधनों को छोड़ने की जिद सारी है।

नारी नर पर भारी है
फिर भी वह बेचारी है।

— डॉ अ कीर्तिवर्द्धन

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