दोहे मन क़ो मोहे
मन में भरकर प्रीत तुम,कैसे रखते धीर ?सुन ओ मेरे रांझिया,व्याकुल तेरी हीर ।। श्वास श्वास में तुम बसे,तुम ही
Read Moreमन में भरकर प्रीत तुम,कैसे रखते धीर ?सुन ओ मेरे रांझिया,व्याकुल तेरी हीर ।। श्वास श्वास में तुम बसे,तुम ही
Read Moreनव जलधारा अवतरित धरा पर,सिक्त हुआ अंतर्मन,विकसित हुईं हृदय-कलिकाएँ,सुरभित गृह-प्रांगण। अव्यक्त भाव हैं अंतस में,विरह-वेदना तज देना,नव आगमन हो तो
Read More“क्या हुआ निखिल? इतनी दूर से क्या इशारा कर रहे हो… कुछ समझ नहीं आ रहा।” कहकर नंदिनी फिर कार्यक्रम
Read Moreहर रोज़ ये चाँदगगन से उतरकरमेरी मुंडेर पर आकरपर्दों में उलझ जाता है। वो आता है संदेश लिएकिसी के उस
Read Moreकभी कभी कुछहो जाता लेकिन क्याठीक-ठीक कुछकहा नहीं जा सकता।बस इतना सा अहसास किकभी-कभी, बिना किसी अपेक्षा के,बिना किसी स्वार्थ
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