कविता

अनुराग वृष्टि

नव जलधारा अवतरित धरा पर,
सिक्त हुआ अंतर्मन,
विकसित हुईं हृदय-कलिकाएँ,
सुरभित गृह-प्रांगण।

अव्यक्त भाव हैं अंतस में,
विरह-वेदना तज देना,
नव आगमन हो तो नयन भरें फिर,
प्रेम-वृष्टि में बह लेना।

अश्रु-धारा ने प्रक्षालित किया,
नयनों का शून्य प्रांगण,
विगत स्मृतियाँ विलीन हुईं सब,
भार-रहित हुआ यह मन।

शुष्क कोण भी सिक्त हुए अब,
पिपासा शांत हुई मन की,
स्नेह-बिंदु से महक उठी है,
पावन बेला जीवन की।

मंद पीड़ा अब द्रवित हो रही,
बनकर मधु-रस धारा,
सिक्त हृदय में प्रतिध्वनित है,
प्रीति-राग का एकतारा।

तुम संग प्रतिपल कोमल है,
जैसे श्रावण गाता है,
श्रवण कर मानस का मधु-गुंजन,
हृदय-मयूर थिरकता है।

गहन स्नेह हृदय में स्थित,
जैसे शांत प्रकाश हो,
स्मृतियों की कोमल छाया,
जैसे पीयूष-कलश हो।

तुम बिन सर्वत्र शून्य सा,
रिक्त भाव का डेरा है,
बनकर मधुर स्वप्न आ जाओ,
तुम बिन घोर अंधेरा है।

निशि-बेला के इन क्षणों में,
पक्ष्मों पर तुम आ जाना,
हृदय-मौन भंग कर प्रिये अब,
स्वर्ण-स्वप्न सजा जाना।

पूर्ण करो प्रतीक्षा मेरी,
अब न हमें तरसाना तुम,
प्रेम-दीप प्रज्वलित कर पथ में,
जीवन-मार्ग आलोकित करना तुम।

— सविता सिंह मीरा

*सविता सिंह 'मीरा'

जन्म तिथि -23 सितंबर शिक्षा- स्नातकोत्तर साहित्यिक गतिविधियां - विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित व्यवसाय - निजी संस्थान में कार्यरत झारखंड जमशेदपुर संपर्क संख्या - 9430776517 ई - मेल - meerajsr2309@gmail.com

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