मौन
किस किस की सुनें,
हमारी सुनता है कौन
ध्यान रखें किस किसकी,
हम हो गए मौन
कांच से नाजुक थे सपने,
जो बने अफसाने
अब नींद भी नहीं आती,
कहां गयी न जाने
जब तक सपने थे,
जिंदा थी उम्मीदें
अंदर छाया अंधेरा
खोजता उजाला उनींदे
शून्य से चले थे,
शून्य तक है जाना
मध्य मद मोह है,
सब कुछ है बहाना
हमने रखी थी सदैव
एक बात का ध्यान
न फैलाया हाथ कभी
न मांगा कभी दान
आंखों की नमी छुपाकर,
होंठों पर हंसी लाकर
संग चलता रहा हर बार
सामने वाले पर छोड़ दिया
कितना समझा हमें हर बार
नदी बन गया हूं मैं
समेट कर सब चलना है
तली में ठहरा हुआ हूं
अनवरत जीवन संग बहना है
उम्र के इस पड़ाव पर जाना
अधूरा सा रह गया हूं मैं
अपनों के बीच होकर भी
कहीं खो गया हूं मैं
— श्याम सुन्दर मोदी
