नेह-विटप
चलो आज कुछ स्वप्न बुनें,
मन-उपवन से पुष्प चुनें,
कर लें सूक्ष्म संचय हम,
मृदा-हृदय में भाव गुनें।
जब अंकुरित हों भाव-सुमन,
नेह-जल से हों सिंचित तन,
सहेजूँ स्पंदन अंजूरी भर
हँस उठे हरितिम मधुवन।
जब-जब आए मधुप अलि,
पार्श्व बसाऊँ लज्जित कलि,
प्रीत-मकरंद संजो,
उड़े गगन ले सुवास चली।
पुष्प-पंखुरी से पुनः,
बीज रूप धरें जीवन,
मृदा-मिलन में लीन हो,
वृहत् वृक्ष से विकसित वन।
यह क्रम अनवरत ही चले ,
नव-रूपों में जीवन ढले,
यह शाश्वत गति अविचल,
लहरित हो सृष्टि के तले।
हम भी कुछ संकल्प गढ़ें,
संग-संग कुछ स्वप्न जड़ें,
स्नेह-लेपित धरा-तन पर,
एक प्रीति-विटप विकसित करें।
छाया तले फिर संग मिलें,
शांत हों संताप के छले,
जड़ दृढ़ हो अंतर-तल में,
ताप-दाह सब दूर चले।
दुःखाग्नि में दीप जले,
नेह-सिक्त उर दृढ़ पले,
मार्ग कठिन यदि आ पड़े,
पग न रुके, संकल्प चले।
— सविता सिंह मीरा
