मधुमालती
रख कर तेरे कांधे पर सर
मधुमालती प्रिये बन जाऊँ,
मलय पवन की ही भाँति सुनो
बस तुझक़ो ही मैं महकाऊँ।
चंचल चारु चंद्रिका बन कर,
चितवन में ही अब खो जाऊँ,
सुरभित सजल समीर सरीखी,
साँसों में सदा समा जाऊँ।
हृदय-हार बन कर हे प्रियवर!
उर-पर ही अंकित हो जाऊँ,
प्रेम-पीयूष प्रवाहित कर,
जीवन की ये ज्योति जगाऊँ।
तव दर्शन पाकर खिल उठी,
रोम-रोम की आज कली,
तुझमें मिलकर पूर्ण हुई मैं,
बनकर प्रियवर ! मधुमालती।
— सविता सिंह ‘मीरा’
