किताब कब खींचेंगे तुम्हें?
किताब होते ही है पाठक वर्ग को खींचने वाले,
होता है इनका नशा चाहे खा रहे हों निवाले,
ये किताबों की ही ताकत थीं
जो अपना मस्तिष्क गिरवी रख
चलते रहे कुछ अति चालक लोगों के
बताए हुए ऊलजलूल राहों पर,
पकड़ नहीं बन पा रही समान दिखते बाहों पर,
खैर ज्ञान की ललक वालों को
किताबें खींचती रहती है
विद्यालय,मदरसे, कॉलेज की ओर,
पढ़ते ही नहीं लगाना पड़ता अतिरिक्त जोर,
ले जाता है ज्ञान विज्ञान की धरा पर,
सच और झूठ समझने करता है असर,
मगर अंधभक्ति में डूबे वंचित लोग,
जातियता में फंसे बहुजन लोग,
दिखावे में डूबे सर्वजन लोग,
आस्था में डूबी दुनिया की शिक्षित आधी आबादी,
कब सोचोगे धन व समय की बर्बादी,
सभी धर्मों के सार को पकड़ो,
मानवता और मेलमिलाप की तार में ज़कड़ो,
पुस्तकों के चुंबकत्व में खींचे जाओ,
नशा जुआ जाति धर्म के मोह को भुलाओ,
महसूस करो इस खिंचाव को,
समझो पर्यावरण प्रकृति के भाव को,
जो तुम्हें मिलेगा किताबों में,
तो बताओ जरा कब खींचेंगे किताब तुम्हें,
जो बना सकती है नवाब तुम्हें।
— राजेन्द्र लाहिरी
