माँ तो बस माँ है
शब्द ब्रह्म बौना लगे, रीते सकल विधान।
माँ के पावन चरण में, झुके स्वयं भगवान॥”
स्त्री का आँचल हो या पुरुष का अंतस,
हर हृदय में एक माँ की करुणा जीती है।
जो दूसरों की वेदना और संवेदना को,
मौन रहकर भी भीतर ही भीतर पीती है।
देखा है हमने पिता के भीतर भी उस ममत्व को,
जो कभी अपनी विवशताओं को कहता नहीं
आज हमारे पास जो वैभव, जो संबल है,
वह उनकी साधना के बिना संभव होता नहीं।
वह स्वयं नींव बनकर धरा में समा जाते हैं,
ताकि संतान के सिर पर छत अडिग रहे।
पर एक पिता को भी इतना मर्मस्पर्शी बनाने में,
उसी माँ का आशीष हर क्षण साथ रहे।
मैं कैसे उतारूँ माँ के उस असीमित विस्तार को,
कागज़ के इन छोटे और सीमित टुकड़ों पर?
मेरी लेखनी अक्षम है, मेरे पन्ने बहुत छोटे हैं,
इस अनंत वात्सल्य को समेटने के संकल्प पर।
मैं हार जाती हूँ जब भी माँ को लिखना चाहती हूँ,
क्योंकि सृष्टि के सारे शब्द छोटे पड़ जाते हैं।
जब भी माँ की महिमा को नापना चाहता है कोई,
तो संसार के सारे भाव बौने रह जाते हैं।
कोई संज्ञा,कोई विशेषण,कोई परिभाषा नहीं उसकी,
वह तो स्वयं में आदि और अनंत का प्रमाण है।
तुलना किससे करूँ उस ममता के समंदर की,
शब्दों में क्या बाँधना… माँ तो बस माँ है!
— सविता सिंह ‘मीरा’
