माँ, जो शब्दों में समा न सकी
सोचती हूँ, तुम्हें श्वेत पन्नों पर उतार दूँ,
मगर मेरी लेखनी की सामर्थ्य
हर बार कम रह जाती है।
चाहा कि बाँध लूँ तुम्हें
पंक्तियों के कुछ छन्दों में,
पर तुम्हारी ममता की परिभाषा,
हर बार अधूरी रह जाती है।
कभी वर्णों का संचय छोटा पड़ता है,
तो कभी भावों की स्याही
निःशेष हो जाती है,
नित नवीन संकल्प से
रचती हूँ तुम्हारा स्वरूप,
पर तेरी आभा के सम्मुख,
मेरी मेधा झुक जाती है।
खंगाल डाले मैंने संसार के
समस्त शब्दकोश,
कर लिया वांग्मय का
गहरा गहन अध्ययन,
पर तुम तो हर क्षण
एक नूतन रूप में प्रकट होती हो।
संभव ही नहीं उस ‘दिव्यता’
का सजीव चित्रण।
तुम व्याकरण और छंदों के
बंधनों से परे,अथाह,
अक्षुण्ण और अनंत हो।
‘माँ’… महज़ दो अक्षरों का
शब्द नहीं, एक महाकाव्य है,
जिसमें सृष्टि का आदि
और करुणा का अनंत है।
वाल्मीकि की रामायण हो
या तुलसी का ‘मानस’ पावन,
कालिदास के महाकाव्यों सा
विस्तृत तेरा विस्तार है।
जब उन ग्रंथों के पन्नों में भी,
तुम पूरी समा न सकीं,
तो मेरी तुच्छ लेखनी का,
भला क्या आधार है?
तुम इस धरा की धुरी
वात्सल्य का पूर्ण व्याकरण हो,
शिशु की पहली किलकारी,
निद्रा का सुखद आवरण हो।
थपकियों में बसी लय तुम,
लोरी का मधुर स्वर हो,
तुम अधूरी नहीं माँ,
तुम तो परिपूर्णता का शिखर हो।
लो, आज फिर मेरा प्रयास
मौन की दहलीज़ पर है,
मेरी ये ‘अपूर्ण रचना’ ही,
मेरा सबसे पावन तर्पण है।
जो कह न सकी, जो लिख न पाई
पन्नों पर…वो अशब्द भाव,
वो समूचा अस्तित्व, बस तुमको अर्पण है।
— सविता सिंह मीरा
