जिजीविषा नित देखिये
गिरती मकड़ी डोर से, जब तक उलझे तार।
जिजीविषा नित देखिये, माने कभी न हार।।
तिनका चुन चुन चोंच में, मूक हृदय ले पीड़।
जिजीविषा खग की रही, बुनता सुंदर नीड़।।
भूखा घर से है चला, रोटी की ले आस।
खून पसीना एक कर, आता मुख उल्लास।।
नट का देखो खेल यह, रोटी एक सवाल।
औरों को खुश है करे, जीवन संकट डाल।।
कुछ करने की चाह में, भरिये वृहत उड़ान।
रुकना मत झुकना नहीं, चाहे हो तूफान।।
मन के हारे हार है, मत करना स्वीकार।
सुन भीतर आवाज को, करती जीत पुकार।।
मुट्ठी में आकाश हो, नैन सिंधु लें सोख।
जिजीविषा बल साध के, हिम्मत भरती कोख।।
खग मुड़ता जब शाम को, नीड़ बहुत है दूर।
आंख शिकारी से बचे, यत्न करे भरपूर।।
जिजीविषा जिस मन रही, उगता सूरज हाथ।
बढ़े धैर्य मन साथ ले, शिव उस का है नाथ।।
— शिव राज सन्याल
