नहीं सिर को झुकाते हो
खुदा के दर कभी जाके नहीं सिर को झुकाते हो।
बड़े खुदगर्ज बंदे हो, जरूरत पर बुलाते हो।
रहे सादा सदा बन के, तिलक माथे लगा कर के,
नहीं यह कर्म शुभ तेरे, यतीमों को सताते हो।
नहीं महजब सिखाता है, करो नफरत यहाॅं बंदे,
दुखा के दिल गरीबों का, बड़े दिल पाक जाते हो।
सजा के देख टूटे दिल, मुहब्बत के सितारों से,
मियां मिट्ठू बड़े बनते, जिगर सब का रुलाते हो।
भले चमड़ी चली जाए, न दमड़ी हाथ से छूटे,
लगाते भोग मालिक को,खुशामद से खिलाते हो।
बड़े ढोंगी छुपे रुस्तम, बड़े उस्ताद भोले हो,
जहाॅं मतलब लगे तो हाथ, अपना जा मिलाते हो।
हिमायत में कभी आते, विवादी बन सताते हो।
खुराफाती मुहब्बत में, नया गुल क्यों खिलाते हो।
हमीं से रूठ कर जाना, नहीं फिर लौट कर आना,
चढ़े जब प्यार की मस्ती, ठिठोली कर मनाने हो।
लगाई प्रीत जो हम से, डरे क्यों फिर ज़माने से,
इशारे से मुझे चुपके, चले आ क्यों बुलाते हो।
सजा सिंदूर माथे पर, लगे मुमताज तुम मेरी,
सलामत की दुआ मांगूॅं, रज़ा अच्छी निभाते हो।
उठे धुंआ वहीं पर आग, समझो है लगी होती,
जले है दिल मुहब्बत में, नहीं आ कर बुझाते हो।
— शिव सन्याल
