प्रकृति की रक्षा को धर्म मानने वाले समुदायों का विश्व आदिवासी दिवस
मानव सभ्यता की प्रथम चेतना से आधुनिक युग तक, कुछ समुदायों ने प्रकृति पर अधिकार नहीं, बल्कि उसके साथ आत्मीय
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Read Moreसभ्यताएँ अपनी सबसे बड़ी पूँजी स्मारकों में नहीं, उन विचारों में बचाकर रखती हैं जो पीढ़ियों का हाथ थामे रहते
Read Moreजीवन कुछ सच बहुत देर से खोलता है। उनमें सबसे गहरा सच यह है कि माँ का अर्थ तब समझ
Read Moreसमय बहुत कुछ छीन लेता है, लेकिन कुछ स्वर उसकी पकड़ से बाहर रह जाते हैं। वे उम्र नहीं गिनते,
Read Moreराष्ट्रों की असली ऊंचाई उनके हिस्से आए अवसरों से नहीं, छिन गए अवसरों के बाद के प्रदर्शन से मापी जाती
Read Moreतिरंगे की छांव में खड़े होकर अब केवल बीते संघर्षों को याद करना पर्याप्त नहीं, बल्कि यह जानना भी जरूरी
Read Moreराष्ट्र केवल सीमाओं, शासन या संविधान से नहीं बनते; वे उन प्रतीकों से गढ़े जाते हैं जिनमें करोड़ों लोगों की साझा स्मृतियाँ, आकांक्षाएँ
Read Moreशब्दों से समाज की आत्मा लिखने वाले साहित्यकार विरले होते हैं। 31 जुलाई केवल जन्मतिथि नहीं, उस युगदृष्टा का स्मरण
Read Moreमेरी कॉलोनी में रहने वाले एक वृद्ध की दिनचर्या वर्षों से नहीं बदली थी। हर शाम वह चारपाई पर बैठकर
Read Moreजब संसार प्रकाश के साधनों से जगमगा रहा हो, फिर भी मनुष्य का अंतर्मन अज्ञान, भ्रम और बेचैनी के अंधकार
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