पर्यावरण

धरती का दर्द आँकड़ों में नहीं, महिलाओं की ज़िंदगी में दिखता है

जब धरती बीमार पड़ती है, उसकी पहली आह एक स्त्री सुनती है। उसे पर्यावरण संकट समझने के लिए वैज्ञानिक आँकड़ों की ज़रूरत नहीं, क्योंकि वह इसे रोज़ महसूस करती है—घटती हरियाली, बदलते मौसम, धुएँ भरी हवा और बढ़ती गर्मी में। एक बच्चे ने माँ से पूछा, “माँ, अब गर्मी इतनी ज़्यादा क्यों लगती है?” माँ शब्दों में भले न समझा सकी, लेकिन वह बदलती प्रकृति का सच जानती थी। 05 जून को दुनिया विश्व पर्यावरण दिवस मनाती है, पर एक महिला के लिए पर्यावरण रोज़ का संघर्ष है। वह इसे महँगी रसोई, घटते पानी और बच्चों की बिगड़ती सेहत में जीती है। शायद इसलिए पर्यावरण संकट की सबसे गहरी चोट स्त्री पर दिखाई देती है, क्योंकि प्रकृति और स्त्री—दोनों जीवन देती हैं, सँभालती हैं और बचाने की कोशिश करती हैं।

जिस प्रकृति ने सदियों से मानव जीवन को सँभाला, आज वही इंसानी लालच से घायल है। “प्रकृति से प्रेरित। जलवायु के लिए। हमारे भविष्य के लिए।” — विश्व पर्यावरण दिवस 2026 का यह विषय आने वाले संकट की चेतावनी है। प्रकृति हमेशा संतुलन सिखाती रही है—पेड़, नदियाँ और धरती निस्वार्थ जीवन देती हैं। लेकिन विकास की अंधी दौड़ में इंसान ने प्रकृति को केवल संसाधन समझा। नतीजा सामने है—उजड़ते जंगल, प्रदूषित नदियाँ, ज़हरीली हवा और बढ़ती गर्मी। इसकी सबसे गहरी मार उन पर पड़ रही है, जिन्होंने यह संकट पैदा नहीं किया—खासतौर पर महिलाओं पर। तपती धूप में दूर से पानी लाती एक स्त्री केवल घर नहीं सँभालती, बल्कि बिगड़ते पर्यावरण का भार भी उठाती है।

गाँव की महिलाएँ भले ही “पर्यावरण विशेषज्ञ” न कहलाएँ, लेकिन प्रकृति की भाषा सबसे गहराई से वही समझती हैं। मिट्टी की गंध से वह बारिश पहचान लेती है और पेड़ों की हालत देखकर मौसम का बदलता स्वभाव समझ जाती है। उसके लिए जंगल सिर्फ लकड़ी नहीं, जीवन का आधार हैं। रिपोर्टें कहती हैं कि जलवायु परिवर्तन की सबसे गहरी मार महिलाओं और बच्चों पर पड़ती है, लेकिन इसका सबसे सच्चा प्रमाण वे चेहरे हैं, जो सूखे कुओं और बंजर खेतों के बीच भी परिवार की उम्मीद बचाए रखते हैं। शहरों में भी महिलाएँ प्रदूषण, बढ़ती गर्मी, प्लास्टिक से घिरा जीवन और मानसिक तनाव से जूझ रही हैं। धुएँ भरी हवा में बच्चे को बाहर भेजती एक माँ का डर किसी आँकड़े से कहीं अधिक वास्तविक होता है।

इतिहास गवाह है कि जब-जब प्रकृति पर संकट आया, सबसे पहले महिलाओं ने ही उसके पक्ष में आवाज़ उठाई। चिपको आंदोलन इसका सबसे जीवंत उदाहरण है, जहाँ उत्तराखंड की ग्रामीण महिलाएँ पेड़ों से इस तरह लिपट गईं, मानो अपने बच्चों की रक्षा कर रही हों। उनके लिए जंगल केवल लकड़ी नहीं, बल्कि पानी, हवा और जीवन का आधार थे। इसी सोच को वंगारी मथाई ने लाखों पेड़ लगाकर नई शक्ति दी। आज भी भारत के कई गाँवों में महिलाएँ बीज संरक्षण, वर्षा जल संचयन और जैविक खेती के जरिए चुपचाप धरती को बचाने में जुटी हैं। विडंबना यह है कि जिन्हें समाज अक्सर “कमज़ोर” कहता है, वही पर्यावरण की सबसे मज़बूत प्रहरी बनकर उभरती हैं।

आज संकट केवल प्रकृति के उजड़ने का नहीं, इंसानी संवेदनाओं के मरने का भी है। कभी बच्चे मिट्टी में खेलते थे, आज स्क्रीन पर प्रकृति खोजते हैं। जो आँगन कभी पेड़ों की छाँव से जीवित थे, अब सीमेंट में कैद हैं और जो बारिश कभी सुकून थी, वही अब डर बन चुकी है। आधुनिकता ने सुविधाएँ दीं, लेकिन मनुष्य को प्रकृति से दूर कर दिया। विडंबना यह है कि हम एयर कंडीशनर में बैठकर ग्लोबल वार्मिंग पर चिंता करते हैं, जबकि वही सुविधाएँ धरती का ताप बढ़ा रही हैं। इस सच को महिलाएँ सबसे गहराई से समझती हैं, क्योंकि उनका जीवन पानी, हवा और घर की ज़रूरतों से जुड़ा है। वे जानती हैं कि जिस दिन साँस और पानी भी बिकने लगेंगे, सबसे पहले गरीबों का जीवन संकट में पड़ेगा। इसलिए पर्यावरण संरक्षण केवल हरियाली का नहीं, मानव अस्तित्व और सामाजिक न्याय का प्रश्न भी है।

धरती को बचाने की लड़ाई बड़े भाषणों से नहीं, घर की छोटी आदतों से जीती जाएगी। और इसकी सबसे मजबूत शुरुआत एक स्त्री कर सकती है। एक माँ यदि बच्चे को पानी बचाना, भोजन की कद्र करना, पौधों से प्रेम करना और प्लास्टिक से दूरी रखना सिखा दे, तो वह केवल आदतें नहीं, आने वाली पीढ़ियों की सोच बदल देती है। यही “प्रकृति से प्रेरित” जीवनशैली है, जिसकी ओर विश्व पर्यावरण दिवस 2026 दुनिया को लौटाना चाहता है। विकास केवल ऊँची इमारतों और चौड़ी सड़कों का नाम नहीं। सच्चा विकास वही है, जहाँ नदियाँ स्वच्छ हों, हवा साँस लेने लायक हो और बच्चे प्रकृति के बीच खुलकर साँस ले सकें। क्योंकि जो विकास प्रकृति को मिटाकर खड़ा होगा, वह अंततः मानवता को भी मिटा देगा।

आज मानवता एक गहरे विरोधाभास में खड़ी है। इंसान मंगल पर जीवन खोज रहा है, जबकि पृथ्वी पर जीवन बचाना कठिन होता जा रहा है। यह बताता है कि हमने प्रगति तो की, लेकिन संतुलन खो दिया। प्रकृति सिखाती है कि संतुलन टूटे, तो विनाश तय है। इस सच को स्त्रियाँ सबसे सहज समझती हैं, क्योंकि उनका जीवन रिश्तों, जिम्मेदारियों और संवेदनाओं का संतुलन सँभालते बीतता है। वे जानती हैं कि जीवन केवल संसाधनों से नहीं, सहअस्तित्व और संवेदनाओं से चलता है। इसलिए यदि दुनिया को भविष्य बचाना है, तो उसे पर्यावरण को महिलाओं की दृष्टि से देखना सीखना होगा। क्योंकि स्त्री प्रकृति को संसाधन नहीं, जीवन का साथी मानती है।

भविष्य की सबसे बड़ी विरासत धन या तकनीक नहीं, बल्कि बची हुई धरती होगी। 05 जून केवल पर्यावरण दिवस नहीं, मानवता के सामने खड़ा एक कठोर प्रश्न है—क्या हम सचमुच भविष्य बचा रहे हैं? यदि जवाब “हाँ” चाहिए, तो हमें अपनी सोच, आदतें और विकास की दिशा बदलनी होगी। जिस दिन समाज स्त्री और प्रकृति—दोनों का सम्मान करना सीख जाएगा, उसी दिन सच्चा विकास संभव होगा। क्योंकि धरती और स्त्री में एक गहरी समानता है—दोनों निस्वार्थ जीवन देती हैं, दोनों सबसे अधिक सहती हैं, और जब दोनों घायल होती हैं, तब मानवता का भविष्य भी डगमगा उठता है। इसलिए इस विश्व पर्यावरण दिवस पर केवल संकल्प नहीं, बदलाव को जीवन का हिस्सा बनाना होगा।

— कृति आरके जैन

कृति आरके जैन

बड़वानी (मप्र) संपर्क: 79992 40375 ईमेल: kratijainemail@gmail.com

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