गीत/नवगीत

कोचिंग संस्कृति के चौराहे पर

शिक्षा थी संस्कार की, ज्ञान-ज्योति का धाम।
अब बाजारों में बिके, उसका पावन नाम।।

विद्यालय के द्वार से, घटता अब विश्वास।
कोचिंग के विज्ञापन करें, बच्चों का उपहास।।
बेच सफलता का रहे, स्वप्न भरा पैगाम—
अब बाजारों में बिके, उसका पावन नाम।।

बच्चों के कोमल मनों, बढ़ता रोज़ दबाव।
अंकों की इस दौड़ में, खोते अपने भाव।।
प्रतिभाओं के नाम पर, चलता केवल दाम—
अब बाजारों में बिके, उसका पावन नाम।।

शिक्षक भी ब्रांड बन, छाए मंच-अख़बार।
ज्ञान नहीं पहचान का, होने लगा प्रचार।।
फॉलोअर और व्यूज़ ही, बन बैठे परिणाम—
अब बाजारों में बिके, उसका पावन नाम।।

अभिभावक चिंतित हुए, खर्च बढ़ा भरपूर।
आशाओं की गठरियाँ, ले जाते हैं दूर।।
मेहनत से ज्यादा यहाँ, बिकता झूठा काम—
अब बाजारों में बिके, उसका पावन नाम।।

सच्चे गुरु अब भी कई, रखते शिक्षा-ध्यान।
जिनके श्रम से आज भी, जीवित ज्ञान-विधान।।
उनसे ही संभव बने, उज्ज्वल हिंदुस्तान—
अब बाजारों में बिके, उसका पावन नाम।।

‘सौरभ’ फिर से सोचिए, शिक्षा का परिवेश।
राष्ट्र-निर्माणी चेतना, मानवता का वेश।।
ज्ञान, विवेक, चरित्र ही, हों शिक्षा का धाम—
अब बाजारों में बिके, उसका पावन नाम।।

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh

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