विज्ञान

साइबर सुरक्षा का नया सच: जितना भरोसा, उतना बड़ा जोखिम

आज हमारी बैंकिंग, निवेश, सरकारी सेवाएं, सामाजिक संपर्क और व्यावसायिक गतिविधियां पासवर्डों की सुरक्षा पर निर्भर हैं। इसी कारण पासवर्ड मैनेजर्स को डिजिटल सुरक्षा का सबसे भरोसेमंद साधन माना जाने लगा। करोड़ों लोगों ने विश्वास कर लिया कि एक मजबूत मास्टर पासवर्ड उनकी पूरी डिजिटल पहचान की रक्षा कर सकता है। किंतु बीते दो वर्षों की घटनाओं ने इस धारणा को झकझोर दिया है। जून 2025 में 16 अरब लॉगिन सूचनाओं के अभूतपूर्व लीक और फरवरी 2026 में ईटीएच ज्यूरिख तथा यूएसआई लुगानो के शोधकर्ताओं द्वारा बिटवार्डन, लास्टपास, डैशलेन और वनपासवर्ड में 27 गंभीर कमजोरियों के खुलासे ने सुरक्षा के दावों पर प्रश्नचिह्न लगा दिया। अब प्रश्न यह है कि क्या पूरी डिजिटल सुरक्षा किसी एक व्यवस्था के भरोसे छोड़ी जा सकती है।

असल संकट टेक्नोलॉजी से ज्यादा ट्रस्ट का है। आज भी लगभग 94 प्रतिशत पासवर्ड्स अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स पर रिपीट हो रहे हैं, जबकि पासवर्ड मैनेजर्स का प्रयोग सिर्फ करीब 30 परसेंट यूज़र्स ही कर रहे हैं। इन्हें अपनाने वाले यूज़र्स ‘जीरो-नॉलेज एन्क्रिप्शन’ को फाइनल सिक्योरिटी शील्ड मान लेते हैं। लेकिन हालिया अध्ययनों ने इस ट्रस्ट की परतें उधेड़ दी हैं। मैलिशियस सर्वर, की-मैनेजमेंट की वीकनेस और रिकवरी सिस्टम्स की खामियां मिलकर अटैकर्स को पूरे वॉल्ट तक पहुंचने का रास्ता दे सकती हैं। ऐसे में पासवर्ड्स सिर्फ लीक ही नहीं होते, बल्कि बदले और चोरी भी किए जा सकते हैं। इससे स्पष्ट है कि जो सिक्योरिटी अटूट दिखती है, उसकी फाउंडेशन भी उतनी मजबूत नहीं जितनी समझी जाती है।

सबसे बड़ा प्रश्न तब खड़ा होता है, जब सुरक्षा का ट्रस्ट ही रिस्क में बदलने लगे। पासवर्ड मैनेजर्स आज इसी चैलेंज से घिरे हैं। पहले एक अकाउंट का पासवर्ड चोरी होने पर नुकसान सीमित रहता था, लेकिन अब एक वॉल्ट में सेंध पूरी डिजिटल आइडेंटिटी को खतरे में डाल सकती है। लास्टपास का 2022 का डेटा उल्लंघन इसका बड़ा उदाहरण है, जिसके प्रभाव 2025-26 तक क्रिप्टो अकाउंट्स से फंड विदड्रॉल के रूप में दिखाई देते रहे। वहीं 2025 में इन्फोस्टीलर मालवेयर ने 1.8 बिलियन लॉगिन क्रेडेंशियल्स चुरा लिए। साइबर क्रिमिनल्स अब पासवर्ड मैनेजर कंपनियों के नाम पर फेक कैंपेन चलाकर यूज़र्स को नकली लॉगिन पेजेज तक पहुंचा रहे हैं। सुरक्षा का प्रहरी आज स्वयं अटैकर्स के निशाने पर है।

असल चुनौती हमारी सुरक्षा संबंधी पुरानी सोच में छिपी है। अधिकांश लोग मानते हैं कि एक मजबूत मास्टर पासवर्ड ही पर्याप्त सुरक्षा दे सकता है, जबकि साइबर अटैक्स कहीं अधिक एडवांस्ड हो चुके हैं। डिवाइस-लेवल कीलॉगर, ब्राउज़र की कमजोरियां, सप्लाई-चेन अटैक्स और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर पर आक्रमण नए खतरे बनकर उभरे हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार शेयरिंग सिस्टम और पब्लिक-की ऑथेंटिकेशन की कमियां पूरे ग्रुप वॉल्ट को रिस्क में डाल सकती हैं। ‘ज़ीरो-नॉलेज’ भी तभी तक प्रभावी है, जब तक सर्वर और उसकी प्रोसेसेज़ विश्वसनीय रहें। यदि आधारभूत ढांचा ही समझौता कर ले, तो एन्क्रिप्शन की सबसे मजबूत दीवार भी बेअसर हो सकती है। यही सच बताता है कि साइबर सिक्योरिटी में कोई भी टेक्नोलॉजी अजेय नहीं होती।

इसके बावजूद पासवर्ड मैनेजर्स को खारिज करना समाधान नहीं होगा। वास्तविकता यह है कि लगभग 80 प्रतिशत डेटा उल्लंघनों की जड़ पासवर्ड्स का दोहराव है। पासवर्ड मैनेजर्स हर प्लेटफॉर्म के लिए अलग और जटिल पासवर्ड बनाकर इस खतरे को काफी हद तक कम करते हैं। ऑटो-फिल, सिक्योरिटी अलर्ट, डार्क वेब मॉनिटरिंग और सेंट्रलाइज्ड मैनेजमेंट जैसी सुविधाएं उनकी उपयोगिता बढ़ाती हैं। बिटवार्डन की ओपन-सोर्स ट्रांसपेरेंसी तथा वनपासवर्ड और नॉर्डपास द्वारा पासकी टेक्नोलॉजी को अपनाना भविष्य की दिशा का संकेत है। इसलिए जरूरत इन्हें छोड़ने की नहीं, बल्कि अधिक सुरक्षित और समझदारी से अपनाने की है।

साइबर सुरक्षा का अगला दौर धीरे-धीरे पासवर्ड-लेस व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। पासकी टेक्नोलॉजी क्रिप्टोग्राफिक कीज पर आधारित है, जिन्हें पारंपरिक पासवर्ड्स की तुलना में चुराना या ब्रेक करना कहीं अधिक कठिन माना जाता है। यही कारण है कि इसे भविष्य की सिक्योरिटी सिस्टम की नींव माना जा रहा है। हालांकि इसका पूरा इकोसिस्टम अभी पूरी तरह मैच्योर नहीं हुआ है और सभी वेबसाइट्स तथा एप्लिकेशन्स इसे सपोर्ट नहीं करते। ऐसे में यूज़र्स को पुराने और नए दोनों सिक्योरिटी फ्रेमवर्क्स के साथ चलना पड़ रहा है। पासकी रिकवरी और बायोमेट्रिक ऑथेंटिकेशन भी नई चुनौतियां तथा प्राइवेसी से जुड़े प्रश्न खड़े करते हैं। इसलिए नई टेक्नोलॉजी के फायदे के साथ उनके रिस्क को समझना भी उतना ही जरूरी है।

बढ़ते साइबर खतरों के बीच समझदारी का रास्ता सतर्क ट्रस्ट से होकर गुजरता है। एक्सपर्ट्स मजबूत मास्टर पासवर्ड, हार्डवेयर सिक्योरिटी की, मल्टी-लेयर ऑथेंटिकेशन और रेगुलर सिक्योरिटी टेस्टिंग के कॉम्बिनेशन की सलाह देते हैं। सिर्फ क्लाउड पर डिपेंड रहने के बजाय लोकल या हाइब्रिड स्टोरेज ऑप्शंस अतिरिक्त सुरक्षा दे सकते हैं। 2025 में पासवर्ड मैनेजमेंट मार्केट लगभग 3 बिलियन डॉलर का था और 2030 तक इसके तेज़ी से बढ़ने का अनुमान है। फिर भी यूज़र विश्वास की कमी, कॉस्ट और टेक्निकल कॉम्प्लेक्सिटी बड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं। साफ है कि टेक्नोलॉजिकल इनोवेशन के साथ जागरूक और अलर्ट यूज़र भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

बदलते साइबर परिदृश्य का सबसे बड़ा सबक यही है कि सिक्योरिटी कभी स्टेबल नहीं रहती। पासवर्ड मैनेजर्स ने पासवर्ड दोहराव की समस्या घटाई है, लेकिन अब वे खुद साइबर क्रिमिनल्स के निशाने पर हैं। इसलिए न अंधा ट्रस्ट उचित है और न ही उनका पूरी तरह से त्याग। जरूरत सतर्कता, बैलेंस्ड अप्रोच और नई टेक्नोलॉजी के साथ खुद को लगातार अपडेट रखने की है। पासकी, हार्डवेयर सिक्योरिटी कीज, बायोमेट्रिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सिस्टम्स भविष्य की दिशा तय करेंगे, लेकिन सुरक्षा की सबसे मजबूत कड़ी जागरूक यूज़र ही रहेगा। जब तक डिजिटल आदतों में बदलाव नहीं आएगा, साइबर खतरे बने रहेंगे। इसलिए सुविधा नहीं, सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी, क्योंकि एक साइबर अटैक केवल डेटा ही नहीं, बल्कि ट्रस्ट और प्राइवेसी भी छीन सकता है।

— प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

प्रो. आरके जैन 'अरिजीत'

बड़वानी (मप्र)

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