राजनीति

मुसलमानों का गाय प्रेम

आजकल मीडिया मे मुसलमानो द्वारा गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की माँग चर्चा मे हैं. अलतक्कैया मे ये गिरगिट को भी मात दे दें. गिरगिट भी मौसम के अनुसार तेजी से रंग बदलती है ये उससे चार हाथ आगे हैं. एक शेर है “मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ निकला, मेरे हक मे क्या फैसला देगा?” गाय काटने वालों का गाय के लिए प्रेम मानो मुसलमानो का इंसान हो जाना, जो की दुर्लभ है, मानो डाकू का गाँव की रक्षा करना जो की दुर्लभ है, मानो वेश्या का पवित्रता पे ज्ञान देना जो की दुर्लभ है, मानो उल्टी गंगा बहना जो की दुर्लभ है, मानो अंगुलिमाल का अहिंसक हो जाना, जो की दुर्लभ है, यदि अंगुलिमाल को अहिंसक हो जाए तो उसपे बुद्ध की कृपा होगी, मुसलमानो का गाय प्रेम यानी मुसलमानो ने मोदी को बुद्ध मान लिया है?

नही. वो अपने मजाहब् के अनुसार कार्य कर रहें हैं, अल्तक्कैया इनके मजाहब् का महत्वपूर्ण भाग है. जब देख रहें है की राजनीति मे अब उनका बहुत महत्वपूर्ण रोल नही रह गया है, हिंदू इनके कुकर्मो को देर से ही सही लेकिन पहचान कर एक हो गया है और अपनी वोट की शक्ति से सत्ता पलटने का माद्दा रखता है तो ये अल्ताक्कैया वाला ऊँट करवट ले रहा है.

क्राइम का एक महत्वपूर्ण भाग होता है “इंटेंट” या इंटेंशन, इसके बिना क्राईम क्रिमिनल एक्ट नही होता. छिनार औरतें और चरित्रहींन पुरुष सबको अपना जैसा बनाना चाहते हैं और सद्चरित्रता का ढोल पीटते हैं. इन मजाहब् वालों की स्थिति भी एसी ही है, सबको मुसलमान बनाने की और “दारुल हरब” और “गजवाये हिंद ” की कल्पना करने वाले, “बगल मे छुरी मुह मे अली ” वाले गाय खोर मुसलमान यदि गौ प्रेमी हो जाएं तो इनकी मंशा साफ तो नही ही है, मंशा यानी इंटेंट.

देखा जाना चाहिए की बोल कौन रहा है, अदालते खुद पोलिस तक का बयान नही मानती, यहाँ तो चोर साव होने का दम भर रहा तो कोई क्यों माने भले? सरकार को इनकी मंशा की जांच करनी चाहिए, जो होली पे तरुण और ईद पे सूर्या जैसे हिंद्हुवों की कुर्बानी को शवाब समझता हो उस गाय खोर मजाहब् की कौम का अचानक से गाय प्रेमी हो जाना बेहद शंका के दायरे मे लाता है. जबकि इन मजाहब् वालों की करतूतें जग जाहिर हैं। वही बात की वेश्या का दूसरी स्त्रियों को चरित्र पे उपदेश देना। अपराध इस्लाम के हिसाब से करके सजा कानून और संविधान के हिसाब से मांगने वाली मजाहब् कौम का दोहरा पन हर सेकेंड हर बात मे दिखता है। और पब्लिक समझ भी चुकी है, और यही इनकी छटपटाहट है।

जिनके मजाहब् मे बहू से हलाला और बहन से निकाह जायज हो और इनके सामाजिक और सांस्कृत रूप से मान्य हो, स्वीकृत हो, वो गाय के लिए आवाज उठाएं तो हसीं आती है, पहले अपने बहू को बहू और बहन को बहन तो घोषित कर लें मजाहब् वाले फिर गाय पे आयें। मजाहब् वालों का संविधान पे दुहाई, शांति और अमन की बात, इंसानियत पे नसीहत, और गाय पे प्रेम वही है, जो गैर भाजपाई पार्टियों का सेकुलरिसज्म का झंडा उठाना है. जरूरत है इनके इंटेंट को पहचानने की, और सजग रहने की. कालनेमि भी साधू का रूप धरते हैं, और ये समझने वाली बात है. और हाँ गाय पशु नही हिंदुवों की माता है, लेकिन क्या कहा जाए, पशु को सब दिखता है।

— कमल कुमार सिंह

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