लघुकथा – अमलतास की छांव
गर्मी अपने चरम पर थी। धूप मानो धरती को तपाकर उसकी सहनशक्ति को परख रही थी। सड़कें सन्नाटे में डूबी थीं, और हवा भी जैसे थककर कहीं ठहर गई थी। ऐसे कठोर समय में, मोहल्ले के मोड़ पर खड़ा अमलतास अपने पीले पुष्पों से लदा, प्रकृति की अदम्य मुस्कान-सा झिलमिला रहा था।
रीमा रोज़ उस रास्ते से गुजरती थी, पर आज उसके कदम भारी थे। मन में जिम्मेदारियों का बोझ, आँखों में अधूरे सपनों की किरचें और चेहरे पर थकान की धूप उतर आई थी। वह चुपचाप अमलतास की छांव में बैठ गई—मानो जीवन से थोड़ी देर का विराम माँग रही हो।
धीरे से उसने ऊपर देखा। पीले फूलों की छटा जैसे उससे कुछ कह रही थी। तभी एक हल्का झोंका आया, और कुछ फूल उसकी गोद में आ गिरे—नर्म, सुनहरे, जैसे उम्मीद के छोटे-छोटे दीप।
उस क्षण रीमा के भीतर कुछ पिघल गया। उसे लगा, अमलतास उसे समझा रहा है—
“संघर्ष की तपिश ही जीवन को रंग देती है। मैं भी इसी धूप में खिलता हूँ… तुम भी खिल सकती हो।”
रीमा ने उन फूलों को अपनी अंजुरी में सहेज लिया। उसके चेहरे पर एक शांत, आत्मविश्वासी मुस्कान उभर आई।
उसने मन ही मन एक संकल्प लिया— “अब जीवन की हर धूप में, मैं अमलतास की तरह ही खिलूँगी—चुपचाप, मगर पूरे साहस के साथ।”
— मंजूषा श्रीवास्तव “मृदुल”
