सात्विक धर्म
वे बहुत भूखे है
पर खाने के नही
तुम्हारे हिस्से खाने के।
वो प्यासे भी है
पर नीर के नही
तुम्हारे देह में बहती रक्त वाहिनी के
जिससे चलता है तुम्हारा जीवन।
पर यथार्थ को समझना होगा
वे हिंसक जीव नही है
जो रक्त को मुँह से लगाये
पर उससे कम भी नही
क्योकि वो ढोंग करते हैं
शाकाहारी होने का
तभी तो
वो चूस लेना चाहते हैं
इनके हर एक माध्यम को
इससे उसकी सात्विक धर्म भी
बना रहता है
और शोषण भी हो जाता है
किसी को पता भी नही चलता
आदर पाने का
यह भी एक सात्विक माध्यम है।
— चन्द्रकांत खुंटे ‘क्रांति’
