Author: चन्द्रकांत खुंटे 'क्रांति'

कविता

तकिया चल पड़ा

शिरोधान गतिशील हुआ आजढूँढने श्रमजीवी के मस्तक-ताज।जिसने दिनभर पाषाण विदीर्ण कियाअसंख्य बोझ निज कंधों पर लिया।चतुष्पथ पर जो नित रहा

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कविता

शोर मचता

शोर मचता, बिल्कुल शोर मचतापत्र पत्रिकाओं, मीडियाओं मेंश्रेष्ठ शीर्षक होतामोटी मोटी अक्षरों में लिखे होतेया प्रमुख हेडलाइन्स होतेगर गिरे होतेकिसी

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