सूख रहे हैं
आज देखा रस्सियों पर अगणित
कपड़े लटके हुए
यह किस-किस के है,पता नहीं?
पर सूख रहे हैं
कभी हवा का झोंका सूखा रही है
तो कभी तेज धूप
कभी आते हैं बादल,सिर पर
कुछ बूँद टपका भी देती है
पर सूखने की क्रिया निरंतर जारी है
उसी जगह, उसी ठौर
रस्सियों में
जैसे होते हैं दरिद्र,असहाय
वर्षों-वर्षों से
एक ही ठौर,एक ही बस्ती में
उसी झोपड़ी में
घास-फूस से ढके, देह ऊपर खोपड़ी में ।
मैं आया था,
इस गली में और एक बार
पर कब पता नहीं?
लगभग दस बरस पहले होगा
पर बदला कुछ नहीं
बस बदले हैं तो वो रस्सी और कपड़ों का रंग
बच्चों का बड़ा होना
छूट गए कुछ वृद्धों का संग ।।
— चन्द्रकांत खुंटे क्रांति
