कविता

मेहतर की दास्ताँ

आज बहुत दिनों बाद
शहर की सड़कों में टहलने निकला था
टहलते वक्त
मेरी मुलाकात
एक मेहतर से हो गयी
देखा उनको तो कीचड़ से लथपथ थे
सिर पर तेज धूप भी बहुत थे
तेज ध्वनि करती
अनेकों गाडियाँ चल रही थी
देख हृदय दहल रही थी
उसी बीच किनारे में वह रस्सी के सहारे
मौत बीच उतर रहे थे
कीच-कीच से तन को तर-बतर कर रहे थे
देख हृदय काँप गया
स्थिति को उनकी भाँप गया
करीब जाकर पूछा उनसे
बाबू! तुम्हे पंक से बास नहीं आता
दूजा काज तुम्हे रास नहीं आता
विनम्र स्वर में बोले
ज्यों निकला हो मिसाइल से गोले
साहब! पापी पेट के कारण लाचार है
जहाँ गरीबी निश-दिन करती वार है।।

— चन्द्रकांत खुंटे ‘क्रांति’

चन्द्रकांत खुंटे 'क्रांति'

जांजगीर-चाम्पा (छत्तीसगढ़)