बदल दिए
जब जाना अपनों के संघर्षों को,
तो हमने भगवान बदल दिए,
जब भी मिला हमें अवसर,
तो पूरे आसमान बदल दिए।
वो कितना खुदगर्ज होता है,
जो समाज की पीड़ा भूल जाता है,
चंद सिक्कों की चमक में पड़कर
अपनों से ही दूर हो जाता है।
इंसान होने का अभिमान छीन
देती है यह जाति की दीवार,
उपलब्धियों को भूल मनुष्य
करने लगता है जन्म पर गर्व अपार।
जब जीवन बचाने को रक्त चाहिए होता है,
तब कोई नहीं पूछता जात और कुल,
न यह देखा जाता है कि
दाता ऊँचा है या फिर कहलाता है शूद्र, अतुल।
उस घड़ी सबसे बड़ा सत्य यही होता है—
हर हाल में बचनी चाहिए जान,
तब याद नहीं रहती पदवी, प्रतिष्ठा,
न धन, न वैभव, न सम्मान।
उन प्रतीकों ने हमें दिया ही क्या,
जिनके कारण अपमान सहे,
दुत्कार सहे, प्रहार सहे,
अनगिनत अन्याय और तिरस्कार सहे।
मगर हमारी पुकार किसी ने न सुनी,
हम भी इंसान थे, यह किसी ने न गिना,
जब अनुभव की कसौटी पर परखा सबको,
तो भ्रम का हर आवरण छिना।
अब परखकर देते हैं सम्मान,
अपने प्रतिमान बदल दिए,
जब जाना अपनों के संघर्षों को,
तो हमने भगवान बदल दिए।
— राजेन्द्र लाहिरी
