कविता

चोरी और सीनाजोरी

वो कर रहे हैं चोरी और सीनाजोरी
सदियों वर्षों से
और यह चोरी अनवरत भी जारी है
जबकि चोरी करने के बाद
लोग सक्ते में आ जाते हैं
किंतु वह इससे अनजान बना है
और सीनाजोरी कर शान से तना है
वो इस कार्य में माहिर है
जिसके कारण गर्व महसूस करते हैं
त्योहारों को पर्व महसूस करते हैं
लोग सत्यता जानते हैं
फिर भी चोरी का विरोध नही करते
सामूहिक गृहों में पड़ते डाका
फिर भी प्रतिशोध नही भरते
इसीलिए उनकी चोरी की मंशा
दिन-ब-दिन ऐसे बढ़ते ही जाती
आजादी से घूमते रहते जेबकतरा
कोई बाल भी बांका नही कर पाती।।

— चन्द्रकांत खुंटे ‘क्रांति’

चन्द्रकांत खुंटे 'क्रांति'

जांजगीर-चाम्पा (छत्तीसगढ़)