गीत/नवगीत

तुझको छोड़ कहां मैं जाऊं?

अब तू ही तो बता साथिया,
तुझको छोड़ कहां मैं जाऊं?

तू गंगा यमुना कावेरी,
सी पावन शीतल निर्मल है।
तू ही मेरे हर सवाल का,
सर्वोत्तम समुचित शुभ हल है।
तू मेरे मन का मनका है,
तुझको जपूंं, तुझी को पाऊं।

मैं आवारा अवश अनाड़ी,
इधर-उधर फिरना फितरत है।
तू चपला चंचल चमकीली,
प्यासी धरती की हसरत है।
किससे करूं याचना? बोलो
किस पनघट पर प्यास बुझाऊं?

मैं निर्बल, तू मेरा संबल,
संगम से पूरा हो जीवन।
अगर ख़ुदा ने ज़ुदा किया तो
तन हो कहीं,कहीं पर हो मन।
प्रेम हमारा रहे सलामत,
बुरी नजर से कहां छुपाऊं?

राम-सिया, राधा-केशव या,
शम्भु – सती, दुष्यन्त पियारी।
मिलन हेतु पग-पग बाधा से,
जूझ रहे हैं हर नर – नारी।
प्रेम पुण्य है या कि पाप, यह
समझूं तब तुझको समझाऊं।

कैसे मिलें नदी के दो तट,
धारा तीव्र प्रवाहमयी है।
तेरा – मेरा प्रेम अमर, पर
शंका होने में विजयी है।
ऐसे हालातों में किस विधि,
अवध प्रीति की रीति निभाऊं?

— डॉ अवधेश कुमार अवध

*डॉ. अवधेश कुमार अवध

नाम- डॉ अवधेश कुमार ‘अवध’ पिता- स्व0 शिव कुमार सिंह जन्मतिथि- 15/01/1974 पता- ग्राम व पोस्ट : मैढ़ी जिला- चन्दौली (उ. प्र.) सम्पर्क नं. 919862744237 Awadhesh.gvil@gmail.com शिक्षा- स्नातकोत्तर: हिन्दी, अर्थशास्त्र बी. टेक. सिविल इंजीनियरिंग, बी. एड. डिप्लोमा: पत्रकारिता, इलेक्ट्रीकल इंजीनियरिंग व्यवसाय- इंजीनियरिंग (मेघालय) प्रभारी- नारासणी साहित्य अकादमी, मेघालय सदस्य-पूर्वोत्तर हिन्दी साहित्य अकादमी प्रकाशन विवरण- विविध पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन नियमित काव्य स्तम्भ- मासिक पत्र ‘निष्ठा’ अभिरुचि- साहित्य पाठ व सृजन