माता-पिता की शरण में अनंत वैकुण्ठ सुख समाया
माता-पिता की शरण में,अनंत वैकुण्ठ सुख समाया है,
उनके चरणों में ही जीवन का सच्चा उजियारा छाया है।
मंदिर-मस्जिद, तीर्थ सभी अपनी-अपनी राह दिखाते हैं,
पर माता-पिता के आशीष से ही भाग्य सितारे जगमगाते हैं।
लाख करो पूजा चाहे,तीर्थ करो तुम हजार,
माता-पिता का सम्मान बिना,सब कुछ होता बेकार।
उनकी सेवा सबसे ऊँची, यही धर्म का सार है,
उनकी मुस्कानों में ही छिपा ईश्वर का सच्चा द्वार है।
जिस घर में माता-पिता का आदर प्रतिदिन होता है,
वहीं प्रेम का दीपक जलकर जीवन सफल संजोता है।
उनकी वाणी अमृत बनकर हर संकट हर लेती है,
उनकी छाया हर मौसम में सुख की वर्षा देती है।
धन-दौलत,वैभव,यश सब पल भर में मिट जाते हैं,
माता-पिता के पावन रिश्ते जन्म-जन्म तक साथ निभाते हैं
उनके आशीर्वाद से ही हर कठिन राह आसान होती है,
उनकी दुआओँ से हर अधूरी मंज़िल महान होती है।
जीवन का सबसे बड़ा तीर्थ माता-पिता का सम्मान रहे,
हर पल उनके चरणों में श्रद्धा का मधुर प्रणाम रहे।
किशन उनकी सेवा को अपना सबसे पहला धर्म बनाता है
धरती पर रहकर भी वैकुण्ठ सुख का आनंद पाता है।
— किशन सनमुखदास भावनानी
