कविता

प्रकृति

ऐ प्रकृति! तुझे भूलना आसान नहीं
भले कट जाओ,खप जाओ
समाप्त हो जाओ
पर तुझे तज पाना आसान नहीं
ये जिंदगी सरल बनी है
या सरल लग रही है,उसकी वजह तुम हो
तुम्हारी ही छाया में यह दुनिया पूरी है
और जो जिंदगी के सुकून है
सुख-चैन आराम है
श्वास चल रही है,धड़कन मचल रही है
मन फुदक रहे हैं,देह कुदक रहे हैं
सबकी वजह भी तुम हो
सोचो अगर तुम नहीं होती
किसी के जिंदगी में,तो ये वसुंधरा विरान होती
जगह-जगह पर श्मशान होती
तेरी वजह से हम इतरा रहे हैं
और तेरी ही नामोनिशान मिटा रहे हैं
ऐसा करतूत किसी अन्य में देखा है क्या?
किसी पर परोपकार करो,और दुत्कार मिले
तो ये मनुष्य ऐसे ही है
स्वार्थ के लिए किसी से भी छल कर सकते हैं
वो माँ-बाप भी बदल सकते हैं
भ्राता,भ्राता को धोख़ा दे सकता है
तो तुम्हारी क्या बिसात,तुम्हे भी मिटा सकता है?
और यही जारी है,पहले से धूप भारी है
कट रहे वन-उपवन,वर्षा होती दिन चारी है।
तुम अपनी कोमलता नहीं छोड़ रहे हो
यही लाचारी तुम पर पड़ रही भारी है।।

— चन्द्रकांत खुंटे क्रांति

चन्द्रकांत खुंटे 'क्रांति'

जांजगीर-चाम्पा (छत्तीसगढ़)

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