कविता

तकिया चल पड़ा

शिरोधान गतिशील हुआ आज
ढूँढने श्रमजीवी के मस्तक-ताज।
जिसने दिनभर पाषाण विदीर्ण किया
असंख्य बोझ निज कंधों पर लिया।
चतुष्पथ पर जो नित रहा गतिमान
तप्त आतप में झुलसा जिसका प्राण
उस ललाट की अन्वेषण में निकला
जिसका स्वेद बूँद-बूँद बन पिघला।
किन्तु अप्राप्य रहा उसे श्रमजीवी
धूलि-धूसरित सोई थी देह जीवी
सख्त करतल,छालों का साम्राज्य
निद्रा ने घेरा तजकर सब काज्य।
मार्ग-शैया पर जो भी थे लेटे
अभावों के आँचल में लिपटे
बिना आस्तरण, बिना चटाई
धरणी ने ही अंक-गोद बढ़ाई।
मेहनतों के नियति में विश्राम कहाँ?
श्रांत सुशुप्ति ही परमानंद यहाँ
शिरोधान विलाप करे लख यह समाज
कैसा न्याय,कैसा यह तख्त-ओ-ताज?
महलों को जो नित्य-नित्य संवारते
स्वयं बुभुक्षा की अग्नि को धारते
उनके हिस्से केवल क्लान्ति अपार
तकिये बिन सो जाता मनुज निराहार।।

— चन्द्रकांत खुंटे ‘क्रांति’

चन्द्रकांत खुंटे 'क्रांति'

जांजगीर-चाम्पा (छत्तीसगढ़)

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