कविता

बदली हुई तहज़ीब

सोचता हूँ…
कितने सीधे और मासूम थे वो लोग
जो अपनी मोहब्बत, अपनी यादें
किताबों के पन्नों के बीच
एक गुलाब की शक्ल में महफूज़ रखते थे।
वो कागज़ की खुशबू और पंखुड़ियों का सूखना
एक पूरा दौर था सादगी का।
और आज का यह आधुनिक दौर देखिए…
जहाँ लोग किताबें तो नहीं खोलते
पर जब भी मुँह खोलते हैं
तो लफ़्ज़ों की जगह ज़हर उगलते हैं।
तरक्की के इस नए ज़माने में
दिलों की जगह नफ़रत ने ले ली है।
अब किसी के पास वक़्त नहीं
कि वो किसी को याद करे
पर हर किसी के पास पूरा वक़्त है
कि वो अपनी तीखी जुबान से
दूसरों के वजूद को छलनी कर दे।
अजीब विडंबना है—
वो गुलाब रखने वाले कल के लोग पिछड़े कहलाए,
और जुबान पर ज़हर रखने वाले
आज के लोग ‘बेहद स्मार्ट’ और कामयाब बन बैठे।।

— चन्द्रकांत खुंटे ‘क्रांति’

चन्द्रकांत खुंटे 'क्रांति'

जांजगीर-चाम्पा (छत्तीसगढ़)