विस्मृत होते दिनों की सोंधी महक और दशहरा
बचपन की यादें किसी सहेज कर रखी गई धरोहर जैसी होती हैं, जिन्हें छू भर लेने से समय की कई
Read Moreबचपन की यादें किसी सहेज कर रखी गई धरोहर जैसी होती हैं, जिन्हें छू भर लेने से समय की कई
Read Moreपितरहमारे पीछे छूट गया हुआ समय नहीं,वे उस वृक्ष की जड़ें हैंजिसकी शाखाओं परहम अपना वर्तमान टँगा हुआ देखते हैं।
Read Moreअलमारी के ऊपरी खाने में रखी लाल साड़ी को सविता ने आज फिर बाहर निकाल लिया।सुनहरी जरी की महीन बेलें
Read Moreसोनबरसा गाँव के आख़िरी छोर पर कावेरी अम्मा का पुराना घर था। बरसात होते ही वह खिड़की के पास बैठकर
Read Moreधरती डूबी पर्वत कांपे, रोया सकल जहान है।मलबे में सब स्वप्न दब गए, सूने हुए मकान हैं। चीखों से काँपा
Read Moreअगस्त का महीना आते ही लगता है, मानो आकाश ने अपने नील आँचल पर मेघों की श्यामल कढ़ाई कर ली
Read Moreविदेश में रहते हुए उसे कई वर्ष बीत गए थे। अच्छी नौकरी, अपना घर, पत्नी और बच्चों से भरा संसार—जीवन
Read More