स्त्रीत्व : मेरा खोया अस्तित्व
कभी आईने में खुद को देखा था,तो आँखों में एक सपना चमकता था…नाम मेरा भी था, पहचान मेरी भी,जीवन मेरा
Read Moreकभी आईने में खुद को देखा था,तो आँखों में एक सपना चमकता था…नाम मेरा भी था, पहचान मेरी भी,जीवन मेरा
Read Moreमन के भीतर कोई छुपकेधीरे-धीरे गाता है,मौन बने उस संवादों मेंसच अपना मिल जाता है॥ (1)शोर बहुत है इस दुनिया
Read Moreघर में सब कुछ था—सुविधाएँ, सुकून और व्यवस्थित दिनचर्या…बस, जो नहीं था, वह था उस व्यक्ति का नाम, जिसके बिना
Read Moreगर्मी अपने चरम पर थी। धूप मानो धरती को तपाकर उसकी सहनशक्ति को परख रही थी। सड़कें सन्नाटे में डूबी
Read Moreपुराना घर था… मिट्टी की वही सौंधी महक, आँगन में खड़ा नीम का पेड़, और बरसों से साथ निभाती दीवारें।
Read Moreमानव इतिहास में युद्ध कोई नई घटना नहीं है, किंतु आधुनिक युग में इसकी विभीषिका पहले से कहीं अधिक भयावह
Read Moreजिसने मन को जीत लिया हो,वो न कभी भयभीत हुआ।राह कठिन हो या अँधियारी,सदा वही जगजीत हुआ ।1चाहे धूप जले
Read Moreजीवन एक रंगमंच है—पर निर्देशक कोई और है,हम तो बसउसके संकेतों पर चलते पात्र हैं।जन्म के साथ हीहाथ में थमा
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