गीत
अंतरमन का मौन संवाद (गीत)—मंजूषा श्रीवास्तव “मृदुल”मन के भीतर कोई चुपकेधीरे-धीरे गाता है,मौन बने उस संवादों मेंसच अपना मिल जाता
Read Moreगर्मी अपने चरम पर थी। धूप मानो धरती को तपाकर उसकी सहनशक्ति को परख रही थी। सड़कें सन्नाटे में डूबी
Read Moreपुराना घर था… मिट्टी की वही सौंधी महक, आँगन में खड़ा नीम का पेड़, और बरसों से साथ निभाती दीवारें।
Read Moreमानव इतिहास में युद्ध कोई नई घटना नहीं है, किंतु आधुनिक युग में इसकी विभीषिका पहले से कहीं अधिक भयावह
Read Moreजिसने मन को जीत लिया हो,वो न कभी भयभीत हुआ।राह कठिन हो या अँधियारी,सदा वही जगजीत हुआ ।1चाहे धूप जले
Read Moreजीवन एक रंगमंच है—पर निर्देशक कोई और है,हम तो बसउसके संकेतों पर चलते पात्र हैं।जन्म के साथ हीहाथ में थमा
Read Moreभारतीय संस्कृति में नवरात्र केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आत्म शुद्धि और अंतर्मन के जागरण का दिव्य अवसर है।
Read Moreसमय के आईने में मनुष्यता का पुनर्पाठनव संवत्सर की देहरी परफिर आ खड़ा है समय—अधरों पर औपचारिक मुस्कान,और नेत्रों में
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