डिफॉल्ट

गज़ल


बुलबुले सी हुई ज़िंदगी आज की,
रौशनी भी लगे अजनबी आज की।
हर गली में बिछी है चुभन दर्द की,
शोर में गूँजती है सदी आज की।
दिल में उठती रही बेबसी की लहर,
टीससी बस गई हर खुशी आज की।
नींद आँखों से रुख़्सत हुई इस तरह,
जागती रह गई हर घड़ी आज की।
गर्म रिश्तों में आई कमी इस कदर,
बर्फ सी जम गई है लगी आज की।
दर्द लिखती रही ये “मृदुल” रात भर,
हर अदा शायरी बन गई आज की।
—मंजूषा श्रीवास्तव “मृदुल” ✍️

*मंजूषा श्रीवास्तव

शिक्षा : एम. ए (हिन्दी) बी .एड पति : श्री लवलेश कुमार श्रीवास्तव साहित्यिक उपलब्धि : उड़ान (साझा संग्रह), संदल सुगंध (साझा काव्य संग्रह ), गज़ल गंगा (साझा संग्रह ) रेवान्त (त्रैमासिक पत्रिका) नवभारत टाइम्स , स्वतंत्र भारत , नवजीवन इत्यादि समाचार पत्रों में रचनाओं प्रकाशित पता : 12/75 इंदिरा नगर , लखनऊ (यू. पी ) पिन कोड - 226016

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