गज़ल
बुलबुले सी हुई ज़िंदगी आज की,
रौशनी भी लगे अजनबी आज की।
हर गली में बिछी है चुभन दर्द की,
शोर में गूँजती है सदी आज की।
दिल में उठती रही बेबसी की लहर,
टीससी बस गई हर खुशी आज की।
नींद आँखों से रुख़्सत हुई इस तरह,
जागती रह गई हर घड़ी आज की।
गर्म रिश्तों में आई कमी इस कदर,
बर्फ सी जम गई है लगी आज की।
दर्द लिखती रही ये “मृदुल” रात भर,
हर अदा शायरी बन गई आज की।
—मंजूषा श्रीवास्तव “मृदुल” ✍️
