राजनीति

युद्ध की विभीषिका और मानवता का संकट

मानव इतिहास में युद्ध कोई नई घटना नहीं है, किंतु आधुनिक युग में इसकी विभीषिका पहले से कहीं अधिक भयावह हो चुकी है। विज्ञान और तकनीक की प्रगति ने जहाँ मानव जीवन को सरल,सुगम, सुविधाजनक बनाया है, वहीं युद्ध के साधनों की वृद्धि कर उसे अत्यंत विनाशकारी बना दिया है। आज का युद्ध केवल सैनिकों के बीच सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका दुष्प्रभाव समाज के हर वर्ग को झेलना पड़ता है।
युद्ध के समय सबसे अधिक कष्ट सामान्य नागरिकों के ऊपर पड़ता है। घर उजड़ जाते हैं, परिवार बिखर जाते हैं और लाखों लोग विस्थापित हो जाते हैं। युद्ध के कारण शिक्षा, स्वास्थ्य और  आर्थिक व्यवस्था पूर्ण रूप से प्रभावित होती है।शारीरिक मानसिक आर्थिक रूप से व्यक्ति टूट जाता है और बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो जाता है। समाज में असुरक्षा की भावना बढ़ गहराती जाती है।
इतिहास यह बताता है कि युद्ध ने कभी स्थायी समाधान नहीं दिया। युद्ध के बाद केवल विनाश, गरीबी, बीमारी और मानसिक पीड़ा ही शेष रह जाती है। इसलिए यह आवश्यक है कि राष्ट्र आपसी मतभेदों को युद्ध के बजाय संवाद और समझदारी के माध्यम से सुलझाएँ।
मानवता का वास्तविक विकास तभी संभव है जब शांति, सहिष्णुता और सहयोग की भावना को महत्व दिया जाएगा । युद्ध की विभीषिका हमें यह बताती है कि मानव जीवन का सबसे बड़ा मूल्य शांति और प्रेम ही है।
अंततः यह समझना होगा कि युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं, बल्कि नई समस्याओं की शुरुआत है। युद्ध की आग में केवल सीमाएँ ही नहीं जलतीं, बल्कि मानवता की करुणा और संवेदनाएँ भी झुलस जाती हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि विश्व के राष्ट्र शक्ति प्रदर्शन के बजाय शांति और संवाद का मार्ग अपनाएँ। क्योंकि सभ्यता की असली विजय हथियारों से नहीं, बल्कि मानवता, सहिष्णुता और प्रेम से होती है।
अंततः यह समझना आवश्यक है कि युद्ध किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं देता। वह केवल विनाश, पीड़ा और असंख्य आँसुओं की विरासत छोड़ जाता है। युद्ध की ज्वाला में केवल नगर और सीमाएँ ही नहीं जलतीं, बल्कि मानवता की करुणा, विश्वास और संवेदनाएँ भी राख हो जाती हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि विश्व के राष्ट्र शक्ति प्रदर्शन की होड़ से ऊपर उठकर शांति, सहिष्णुता और संवाद का मार्ग अपनाएँ। क्योंकि सभ्यता की वास्तविक विजय हथियारों की चमक में नहीं, बल्कि उस बुद्धिमत्ता में निहित है जो युद्ध को रोककर मानव जीवन और मानवता की रक्षा कर सके।
जब संसार यह समझ लेगा कि हर युद्ध अंततः मानवता की हार है, तभी शांति की सच्ची सुबह इस धरती पर उदित हो सकेगी।

— मंजूषा श्रीवास्तव “मृदुल”

*मंजूषा श्रीवास्तव

शिक्षा : एम. ए (हिन्दी) बी .एड पति : श्री लवलेश कुमार श्रीवास्तव साहित्यिक उपलब्धि : उड़ान (साझा संग्रह), संदल सुगंध (साझा काव्य संग्रह ), गज़ल गंगा (साझा संग्रह ) रेवान्त (त्रैमासिक पत्रिका) नवभारत टाइम्स , स्वतंत्र भारत , नवजीवन इत्यादि समाचार पत्रों में रचनाओं प्रकाशित पता : 12/75 इंदिरा नगर , लखनऊ (यू. पी ) पिन कोड - 226016