लघुकथा

गृह लक्ष्मी : घर की अदृश्य शक्ति

घर में सब कुछ था—सुविधाएँ, सुकून और व्यवस्थित दिनचर्या…बस, जो नहीं था, वह था उस व्यक्ति का नाम, जिसके बिना कुछ भी संभव नहीं था। सच यही था— सुबह की पहली किरण के साथ ही सविता की दिनचर्या शुरू हो जाती—चाय, बच्चों के टिफ़िन, पति का नाश्ता, सास-ससुर की दवा। घर का हर कोना उसकी मेहनत से सजा था, पर उसका नाम कहीं दर्ज नहीं था।एक दिन राजीव ने बताया—“कंपनी इस बार ‘सर्वश्रेष्ठ परिवार’ का पुरस्कार दे रही है।”सास ने गर्व से कहा—“हमारा घर ही जीतेगा।”सविता चुप रही। उसे लगा—क्या सच में यह घर इतना व्यवस्थित है, या इसे व्यवस्थित बनाए रखने में मेरी अनकही मेहनत है?कुछ दिनों बाद चयन समिति आई। हर सवाल का जवाब राजीव और सास-ससुर ने दिया, सविता बस चुपचाप चाय परोसती रही।जाते-जाते एक सदस्य ने पूछा—“आप दिनभर क्या करती हैं?”सविता मुस्कुराई—“बस, घर संभालती हूँ… और अपने हिस्से की इच्छाएँ त्याग देती हूँ, ताकि सबकी इच्छाएँ पूरी हो सकें।”परिणाम आया—उनका परिवार विजेता बना।सम्मान समारोह में मुख्य अधिकारी ने कहा—“हम सफलता का श्रेय अक्सर उस व्यक्ति को देते हैं, जो बाहर काम करता है, पर उस अदृश्य शक्ति को भूल जाते हैं, जो उसके पीछे खड़ी होती है।”उन्होंने राजीव से पूछा—“आपके घर की वह अदृश्य शक्ति कौन है?”राजीव पल भर को मौन रहा, फिर बिना झिझक सविता की ओर इशारा करते हुए बोला—“मेरी पत्नी।”सविता को मंच पर बुलाया गया। मुख्य अधिकारी ने ट्रॉफी देते हुए कहा—“आज मैं आपको केवल ‘गृह लक्ष्मी’ नहीं, बल्कि ‘घर की मुख्य कार्यकारी अधिकारी’ घोषित करता हूँ। घर को संभालना भी उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी है, जितनी किसी संस्था को चलाना।”हॉल तालियों से गूंज उठा। सविता की आँखें खुशी से छलक आई ,उसके अधर स्मित मुस्कान से खिल गए।घर लौटते समय सास ने सविता का हाथ थाम लिया—“बहू, आज समझ आया… तुम घर नहीं, हमें संभालती हो।”राजीव का स्वर मुखर हुआ —“आज से हम सब अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभाएंगे। हर निर्णय में सविता, तुम्हारी बराबर भागीदारी होगी।”आज पहली बार सविता ने दृढ़ स्वर में कहा—“घर तभी घर बनता है, जब सब बराबर हों… जहाँ एक त्याग करे और दूसरा अधिकार, वहाँ संतुलन नहीं—अन्याय होता है।” सब चुप थे—पर इस बार यह चुप्पी सोच बदलने की थी।उस दिन एक ट्रॉफी नहीं मिली थी—एक सोच बदली थी।और शायद उसी पल एक नया समाज जन्म ले रहा था।

सीख: गृह लक्ष्मी वह नहीं, जिसे केवल पूजा जाए— गृह लक्ष्मी वह है, जिसे समझा जाए, सुना जाए और समान अधिकार के साथ सम्मान दिया जाए। सच्चा सम्मान मंच पर नहीं, रोज़ के व्यवहार में दिखाई देता है।
— मंजूषा श्रीवास्तव “मृदुल”

*मंजूषा श्रीवास्तव

शिक्षा : एम. ए (हिन्दी) बी .एड पति : श्री लवलेश कुमार श्रीवास्तव साहित्यिक उपलब्धि : उड़ान (साझा संग्रह), संदल सुगंध (साझा काव्य संग्रह ), गज़ल गंगा (साझा संग्रह ) रेवान्त (त्रैमासिक पत्रिका) नवभारत टाइम्स , स्वतंत्र भारत , नवजीवन इत्यादि समाचार पत्रों में रचनाओं प्रकाशित पता : 12/75 इंदिरा नगर , लखनऊ (यू. पी ) पिन कोड - 226016