टूटे पिंजरे की खनक
“विनी मुझे मेरा घर मेरा सा ही नहीं लगता अब…”
सिया की निराश हताश भरी आवाज मुझे अंदर तक झकझोर जाती थी-
“नौ साल हो गए; बहू रानी जब से आई हैं, ससुर जी के ऑफिस जाने तक आगे पीछे घूमती हैं- पापा जी पपीता काट दूं, पापा जी चाय बना दूं वगैरह-वगैरह। पापा जी के जाते ही अपने कमरे में कछुआ खोल सी दुपक जाती हैं। सारा काम, सारी जिम्मेदारी मैं शुरू से ही निभाती रही हूं; कोई दिक्कत नहीं। लेकिन जब मेरे पति, बहू रानी को आवाज लगाते हैं और पूछते हैं- श्रुति, क्या लाना है बाजार से…? और बहू रानी किचन में बनी, मेरी सामान सूची ले जाकर ससुर जी को थमा देती हैं तो मुझे महसूस होता है कि जैसे मेरा वजूद ही नहीं रहा इस घर में…” कहते कहते उसका गला रुंधने लगा था।
मैंने सिया से कहा था- “तुमने गलती की, शुरू से ही अलग कर देना था बच्चों को…”
सिया बोली-“तुम भाग्यशाली हो विनी, तुम्हारे पति आदर्श समाज तबके के हैं, आत्म-विश्वासी हैं, घर के आंगन में झूठी मुखियागिरी नहीं करते। आम भीड़ तो उन पुरुषों की है
जो बाहर कुछ करें न करें, पर घर में सिंहासन पर विराजमान रहते हैं …और बहू रानी का असली चेहरा तो मैंने देखा है उन्होंने या बेटे ने नहीं।”
उसकी आवाज़ में वर्षों की कैद बोल रही थी। मैं अक्सर महसूस करती थी कि मन की घुटन कैसे किसी को कचोटती है…!
अभी ऑफिस से घर पहुंची ही थी कि फोन बजे उठा। उधर सिया थी— इस बार आवाज़ चहकी हुई थी— हल्की खुली खिड़की से जैसे धूप झाँक रही हो!
“विनी… आज बारह साल बाद मैं कैद से मुक्त हुई।”
“मतलब?” मैं चौंकी।
“रिटायर हो गए हैं न… घर में रहे तो धीरे-धीरे सब समझ गए। बच्चे ऊपर शिफ्ट हो गए हैं। अब चारों ओर शांति है।”
आज उसकी बातों में टूटे पिंजरे की खनक थी। मैंने भी चहकते हुए कहा—“बहुत बहुत बधाइयाँ तुम्हें! अब तो जल्दी ही आऊँगी और तुम्हारे हाथ का बना हलुवा भी खाऊँगी।”
फोन रखते ही लगा, कुछ रिश्ते देर से सही, पर सच की रोशनी में आख़िरकार साँस लेना सीख ही जाते हैं।
— नील मणि
