कविता

बचकर रहना कुटिल मुस्कानों से

नफ़रतों के इस अंधे दौर में
यदि कोई मोहब्बत लुटा जाए,
तो उसे सिर माथे बिठाइए,
दुआओं में उम्र उसकी बढ़ा जाए।

ये यूँ ही नहीं उतरती धरती पर,
ये कुदरत की कोई सौगात है,
जहां हर ओर धुआँ ही धुआँ,
वहीं ये सुकून की बरसात है।

कहीं रंग पर जंग छिड़ी है,
कहीं धर्म बना तलवार,
कहीं जाति की जंजीरों में जकड़ा,
इंसानियत हुई लाचार।

अमीरी-गरीबी के खांचों में
बंट चुका हर एक अहसास,
इतनी गहरी धँसी है नफ़रत,
कि डूबते को भी है भेद का त्रास।

सैलाब में भी जाति पूछे,
धर्म का हिसाब लगाया जाए,
दया, करुणा, मर्म भुलाकर
अहम का झंडा लहराया जाए।

क्या सच में अब ज़रूरत नहीं
इस दुनिया को अच्छाई की?
या फिर आदत पड़ गई है
हर बुराई पर वाहवाही की?

वक्त है अब ठहरकर सोचने का,
अपने भीतर झाँकने का,
न कि झूठे बहकावों में आकर
अपनी ही राह भटकने का।

मुंह मत मोड़ो उन जवानों से
जो सीमा पर दीवार बने,
पर दूर ही रहना उन चेहरों से
जो मुस्कानों में अंगार तले।

बचकर रहना उन लफ्ज़ों से
जो नफ़रत के बीज उगाते हैं,
सियासत की आड़ में अक्सर
इंसान को इंसान से लड़वाते हैं।

करुणा को दिल में जिंदा रखना,
यही असली पहचान है,
वरना इस भीड़ भरे जंगल में
हर चेहरा बस एक अंजान है।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554

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