लघुकथा

साथी साथ निभाना

विदेश से मायके पहुंची बेटी सुबह अपने बेटों की फरमाइश पूरी करने में जुटी है। श्रुति के पूछने पर नाश्ते में बच्चों ने ऑमलेट को चुना। श्रुति ने बच्चों की पसंद की सब्जियां आदि डाल यत्न से ऑमलेट तैयार कर बच्चों को दिया। एक ग्रास मुंह में जाते ही छोटे बेटे ने कहा – “Mom, omelette is tasteless.” दूसरे ने फरमाइश रख दी– “Mom, stuffed potato paratha.” छोटे ने हाँ में सिर हिलाया। अब… दोनों ऑमलेट गए सीधे डस्टबिन में। फिर पंराठे बने। नाश्ता पूरा होने के बाद माँ ने बेटी से धीरे से कहा –
“श्रुति, तुम अपने बच्चों को बिगाड़ रही हो।”
दिन भर बेटी ने देखा कि माँ हर एक-दो घंटे में पापा की कोई न कोई सेवा करती हैं — कभी चाय, कभी दवा, कभी फल। जब मां काढ़ा लेकर जाती तो पापा कहते-
“नहीं, अभी काढ़ा पीने का मन नहीं, अभी सूप ले आओ।”
मां फिर सूप बनाकर ले जाती।
बेटी से रहा न गया, बोली –”माँ, तुमने पापा की आदतें बिगाड़ रखी हैं।”
माँ मुस्कुराई– “बेटा, आदतें तो फौजी महकमे ने बिगाड़ दीं हैं। अब हम अकेले हैं, तो समय भी इन्हीं छोटे-छोटे कामों में कट जाता है। साथ निभाना पड़ता है और थोड़ा सामंजस्य भी बैठाना होता है।”
बेटी की आँखें भर आईं— “अब समझी माँ… इसीलिए तो पापा तुम्हारे बिना कहीं रहना नहीं चाहते।”
किसी ने बहुत सुंदर कहा है-
संबंधों की डोर संग, पकड़े रहना हाथ
बात पकड़ना तुम नहीं, चलते रहना साथ।

— नील मणि

नील मणि

एक कार्टूनिस्ट और लेखक के रूप में सामाजिक, राजनीतिक और पारिवारिक जीवन के विविध रंगों को अपने व्यंग्य, रेखाचित्रों, कविताओं और कहानियों के माध्यम से जीवंत करने की कोशिश में हूँ। स्वतंत्र लेखन में संलग्न हूँ। मेरी रचनाएँ व कार्टून्स विभिन्न प्रतिष्ठित, सरकारी, देश-विदेश की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रही हैं। मोबाइल नंबर -9412708345 मेरठ – 250001 (उत्तर प्रदेश)

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