लघुकथा – बौना
“उफ्! ये चीटियाँ गर्मी आते ही बहुत परेशान करती हैं। रसोईघर तो है ही इनकी जागीर। अब किताबों की अलमारी में चल रही है,” सफाई करती हुई सरला बड़बड़ाती जा रही थी। महेश सदा की भाँति चुपचाप समाचार देखने में व्यस्त था। “मैं तुमसे ही बात कर रही हूँ,” सरला ने गुस्से में कहा। “हाँ, आता हूँ,” कहते हुए महेश अलमारी के पास गया, तो उसने देखा कि वहाँ चींटियों की लम्बी कतार थी। वे अपने मृतक चींटी को उठाये पंक्तिबद्ध हो ले जा रहीं थीं। अचानक शोर सुनकर उसने और सरला बालकनी से झाँका तो देखा कि एक फटेहाल व्यक्ति दुर्घटनाग्रस्त हो अंतिम साँसें गिन रहा था। भीड़ में कुछ लोग वीडियो बना रहे थे।सब पुलिस और एम्बुलेंस की प्रतीक्षा कर रहे थे। यह देख सरला ने कहा था कि क्यों न इन्हें हम अस्पताल ले जाये? इनकी जान बच सकती है। उसने सरला से झल्लाकर कहा था,”तुम्हारा दिमाग खराब है। यह पुलिस केस है। पुलिस के झमेले में पड़ने के लिए मेरे पास समय नहीं है।” पुनः उसकी नज़र चींटियों की लम्बी कतार पर पड़ी।
— डाॅ अनीता पंडा ‘अन्वी’
