माँ की लोरी
माँ सुनाती थी मुझको लोरी
मीठी जैसे शहद की गोली।
जैसे चंदा की शीतल छाया
निंदिया रानी फैलाये माया।
अपनी बाहों में भर लेती
रख गोद में मेरा सिर
सहलाती वह हौले-हौले
जैसे शीतल-मंद पवन डोले।
प्यार का झरना झरता झर-झर
जलतरंग-सा माँ का स्वर।
“सोजा-सोजा राजकुमारी”
तू है मेरी राजदुलारी
तू है मेरे घर की उजियारा
तुझसे रोशन मेरा जग सारा।
आँखें उनींदी, बन्द पलके
जागे तेरे नैनों में मीठे सपने
परियों के देश तू जाये
डर तुझे कभी न सताये
हर पल तेरे साथ रहूँगी
छाया बन तेरी रक्षा करूँगी। “
माँ की लोरी है नहीं गीत
है वह मेरे जीवन का संगीत।
— डाॅ. अनीता पंडा ‘अन्वी’
