कविता

माँ की लोरी

माँ सुनाती थी मुझको लोरी
मीठी जैसे शहद की गोली।
जैसे चंदा की शीतल छाया
निंदिया रानी फैलाये माया।

अपनी बाहों में भर लेती
रख गोद में मेरा सिर
सहलाती वह हौले-हौले
जैसे शीतल-मंद पवन डोले।
प्यार का झरना झरता झर-झर
जलतरंग-सा माँ का स्वर।

“सोजा-सोजा राजकुमारी”
तू है मेरी राजदुलारी
तू है मेरे घर की उजियारा
तुझसे रोशन मेरा जग सारा।
आँखें उनींदी, बन्द पलके
जागे तेरे नैनों में मीठे सपने
परियों के देश तू जाये
डर तुझे कभी न सताये
हर पल तेरे साथ रहूँगी
छाया बन तेरी रक्षा करूँगी। “

माँ की लोरी है नहीं गीत
है वह मेरे जीवन का संगीत।

— डाॅ. अनीता पंडा ‘अन्वी’

*डॉ. अनीता पंडा

सीनियर फैलो, आई.सी.एस.एस.आर., दिल्ली, अतिथि प्रवक्ता, मार्टिन लूथर क्रिश्चियन विश्वविद्यालय,शिलांग वरिष्ठ लेखिका एवं कवियत्री। कार्यक्रम का संचालन दूरदर्शन मेघालय एवं आकाशवाणी पूर्वोत्तर सेवा शिलांग C/O M.K.TECH, SAMSUNG CAFÉ, BAWRI MANSSION DHANKHETI, SHILLONG – 793001  MEGHALAYA aneeta.panda@gmail.com