धर्म-संस्कृति-अध्यात्मस्वास्थ्य

योग कोई गतिविधि नहीं, जीवनशैली

आम आदमी के लिए योग का अर्थ है — सुबह-सुबह पार्क में जाकर दो-चार आसन कर लेना, थोड़ा प्राणायाम कर लेना और फोटो खींचकर सोशल मीडिया पर डाल देना। यह योग नहीं, योग का विज्ञापन है। वर्तमान में यही हो रहा है। हम जीवन नहीं जी रहे, प्रदर्शन कर रहे हैं। विज्ञापनों ने हमारे ऊपर नियंत्रण कर लिया है। हम अपनी आदतों को भी विज्ञापन के अनुरूप बनाते जा रहे हैं। अपने आपका विज्ञापन कर रहे हैं। कहा जाता है- जो दिखता है-वह बिकता है। इसका मतलब हम बिकाऊ वस्तु हैं या इंसान! योग के साथ भी हम वही कर रहे हैं। हम योग को आत्मसात नहीं कर रहे। योग को बिकाऊ वस्तु बना दिया गया है। जबकि योग जीवन की जीवंत प्रणाली है। विज्ञापन में देख रहे हैं और अपने आपको आसन व प्राणायाम के साथ विज्ञापित कर रहे हैं। हम योग को बिना जाने योग के भौतिक लाभ लेना चाहते हैं। योग सर्वांगीण विकास का पथ है, आनंद का स्रोत है; किन्तु किसी भी उपकरण को समझे बिना उसका प्रयोग और प्रयोग के बिना प्रभावी परिणाम केवल सपनों या विज्ञापनों में ही प्राप्त हो सकते हैं।
अब आइए हम योग को समझने का प्रयत्न करते हैं। सर्वप्रथम इसके उच्चारण को सही करें। यह योग ही है, योगा नहीं। योगा आंग्ल भाषा के प्रभाव के कारण गलत उच्चारण किया जाने लगा है। इसमें सुधार करना ही उचित है। आगे विचार करें। योग कोई एक घंटे की कसरत नहीं है। योग 24 घंटे जीने की कला है। योग कोई क्रिया नहीं, जीवन की गुणवत्ता सुनिश्चित करने वाली शैली है। इस शैली में हमारी सभी व्यक्तिगत, पारिवारिक व सामाजिक समस्याओं का समाधान है।
महर्षि पतंजलि ने योग को आठ अंगों में बाँटा — यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। जन सामान्य के लिए योग परलोक सुधारने की, ईश्वर से साक्षात्कार करवाने की लगभग असंभव सी साधना है। हम समझते हैं कि योग क ये आठों अंग योगियों के काम हैं, हमारे नहीं। पर सच यह है कि ये आठों हमारे ही रोज़ के जीवन को ठीक करने के औजार हैं। अभी हम जीवन जी नहीं रहे जीवन को काट रहे हैं। योग को समझकर और आत्मसात कर हम जीवन जीना प्रारंभ कर सकते हैं।
योग के आठों अंगों का संक्षिप्त व व्यवहारिक परिचय अग्रानुसार है-

  1. यम – समाज से संबंध- यम व्यवहार का विज्ञान व कुशलता है। यह समाज के साथ संबन्धों के आधार हैं, जो समाज में हमारे स्थान का निर्धारण करते हैं। यम का अर्थ है – दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करोगे। इसके पाँच नियम हैं – अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह।
    आज के प्रबंधन की भाषा में यही है – सामाजिक नैतिकता (Social Ethics)या व्यवहार कौशल(soft skill)। आप ऑफिस में हैं, क्या आप अपने साथी की टाँग खींचते हैं? वह हिंसा है। क्या आप झूठी रिपोर्ट बनाते हैं? वह असत्य है। क्या आप ऑफिस का समय चुराते हैं? वह अस्तेय का उल्लंघन है। यम हमें सिखाता है कि जब तक समाज से तुम्हारा संबंध शुद्ध नहीं होगा, तुम योगी नहीं बन सकते, अच्छे नागरिक भी नहीं बन सकते।
  2. नियम – स्वयं से संबंध
    नियम का अर्थ है – अपने साथ कैसा व्यवहार करोगे। शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान।
    आज हम बाहर से साफ दिखते हैं, पर भीतर से अशांत हैं। शौच केवल शरीर का नहीं, विचारों का भी चाहिए। संतोष का अर्थ आलस्य नहीं, जो है उसमें प्रसन्न रहकर और बेहतर के लिए प्रयास करना। स्वाध्याय का अर्थ किताब पढ़ना ही नहीं, स्वयं का अध्ययन करना। जो व्यक्ति अपने आपको नहीं पढ़ पाया, वह दुनिया को क्या पढ़ेगा? नियम हमें आत्म-अनुशासन सिखाता है।
  3. आसन – शरीर से संबंध- आसन अर्थात आसान स्थिति। कहा भी गया है- “स्थिरसुखमासनम।” जो स्थिर भी हो और सुखद भी हो, वही आसन है। आसन शरीर की एक स्थिति है, जो शरीर के लिए स्वाभाविक, स्थिर और सुखद हो। कठिनाई से की गई स्थिति आसन नहीं है। जो स्थिति आसानी से प्राप्त की जा सके और शरीर के लिए अनुकूल भी हो, वही आसन है।
    वर्तमान समय में आसनों को ही पूरा योग समझ लिया गया है। पर आसन तीसरा सोपान है, पहला नहीं। बिना यम-नियम के किया गया आसन केवल शारीरिक कसरत है। वह योगयोग के अन्तर्गत नहीं आएगी। आसन का उद्देश्य शरीर को इतना स्वस्थ और स्थिर बनाना कि वह आत्मा की यात्रा में बाधा न बने। शरीर तो मंदिर है, मंदिर गंदा होगा तो कर्म रूपी पूजा कैसे होगी? शरीर ही कर्म करने का साधन, माध्यम या उपकरण है।
  4. प्राणायाम – प्राणायाम श्वास से संबंधित है। प्राण को प्राणवायु अर्थात आक्सीजन से जोड़ा जा सकता है। प्राचीन कालीन दार्शनिक एनिक्सीमेंस ने तो हवा को ब्रह्माण्ड का मूल तत्व माना था। प्राणायाम उसी प्राणवायु को लेकर ऊर्जा वानवान होने का उपकरण है। प्राणायाम का अर्थ साँस को रोकना नहीं, साँस को जानना है। प्राण + आयाम = जीवन ऊर्जा का विस्तार।
    आज का सबसे बड़ा रोग है – तनाव। तनाव का सीधा संबंध श्वास से है। जब मन अशांत होता है, श्वास उखड़ जाती है। जब श्वास को नियंत्रित कर लेते हैं, मन स्वयं नियंत्रित हो जाता है। 5 मिनट का अनुलोम-विलोम, कपालभाति, भ्रामरी – ये कोई चमत्कार नहीं, ये आपके ही नर्वस सिस्टम का रीसेट बटन हैं। यदि हम इसे पांच मिनट तक सीमित न करके जीवन के साथ आत्मसात कर सकें तो कल्पना ही कर सकते हैं। जीवन कितना ऊर्जस्वित हो जाएगा। प्राणवायु की आवश्यकता हर जगह है- कभी भी- कहीं भी। अतः प्राणायाम- जीवन शैली का भाग है- कहीं भी- कभी भी।
  5. प्रत्याहार – इंद्रियों से संबंधित है। यह सर्वविदित है कि इंद्रियों के माध्यम से ही हम संवेदना व अनुभव प्राप्त करते हैं तो इंद्रियों के माध्यम से ही हम अपने कर्म संपन्न करते हैं। यही कारण है कि इंद्रियों का वर्गीकरण ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेंद्रियों केके रूप में किया जाता रहा है। इद्रियों को ही हमें वासनाओं में भटकाने का दोष भी दिया जाता रहा है।
    प्रत्याहार का अर्थ है – इंद्रियों को बाहर से भीतर की ओर लौटाना। आज हमारे दुःख का सबसे बड़ा कारण है – हर समय बाहर देखना। मोबाइल, टीवी, सोशल मीडिया – आँखें, कान, सब बाहर ही तो भटक रहे हैं। यह भटकन हमें शारीरिक व मानसिक रूप से रोगी बना रही है। हम मनुष्य कम पशु अधिक हो जाते हैं। इस स्थिति से उन्नयन करने वाली योगिक क्रिया है- प्रत्याहार।
    प्रत्याहार कोई आँख बंद करना नहीं है, यह मन का डाटा बचाना है। जैसे कछुआ खतरा देखते ही अपने अंगों को भीतर खींच लेता है, वैसे ही साधक व्यर्थ की सूचनाओं से अपने को भीतर खींच लेता है। सूचनाओं के कचड़े में से उपयोगिता औरऔर सृजनात्मकता को बचाने का काम प्रत्याहार से ही संभव है। जो व्यक्ति प्रत्याहार नहीं जानता, वह कभी फोकस नहीं कर सकता।
  6. धारणा – एकाग्रता से संबंधित है। धारणा किसी एक विषय को धारण करना है। किसी एक बिंदु पर मन को टिकाना, धारणा है। आज के युग में सबसे बड़ी कमी धारणा की ही है। हम सब कुछ एक साथ करना चाहते हैं – खाना खाते हुए मोबाइल, पढ़ते हुए गाने, बात करते हुए कुछ और सोचना। यह मल्टीटास्किंग नहीं, मल्टी-फेल्योर है।
    धारणा सिखाती है – जो करो, उसी में पूरे हो जाओ। पढ़ो तो सिर्फ पढ़ो। सुनो तो सिर्फ सुनो। यही सफलता का सूत्र है। एकाग्रता की कमी से आज केवल किशोर और युवा ही नहीं, हम सब जूझ रहे हैं। हम जो भी करें, वही करें- मन-वचन-कर्म में एक ही विषय धारण करें। रजनीश ओशो इसी स्थिति को ध्यान से जोड़ने के पक्षधर रहे हैं।
  7. ध्यान – जागरूकता से संबंधित है। धारणा से अगली स्थिति। धारणा जब सहज और निरंतर हो जाती है, तो वही ध्यान बन जाती है। ध्यान कोई आँख मूँद कर बैठना नहीं है, ध्यान तो हर काम को ध्यान से करना है। यदि आप खाना ही खा रहे हैं। आप अध्ययन कर रहें हैं तो अध्ययन ही कर रहे हैं। चाय बनाना भी ध्यान हो सकता है, यदि उसे पूरे होश से बनाया जाए। और पूजा भी ध्यान नहीं है, यदि मन कहीं और भटक रहा हो। ध्यान कोई अल्पकालीन गतिविधि नहीं हैहै जिसे रुककर याया बैठकर संपन्न किया जा सके। ध्यान हमें सिखाता है – वर्तमान में जीना। जो वर्तमान में है, वही ध्यान में है; जो ध्यान में है, वही आनंद में है।
  8. समाधि – योग के अष्टांगों में सबसे अंत में समाधि का स्थान आता है। सभी योगिक क्रियाओं का साध्य समाधि को माना जाता है। धारणा- ध्यान और समाधि के नाम तो गिनाए जाते हैं, किंतु जन सामान्य इनके अर्थ को समझने तो क्या जानने के भी प्रयत्न नहीं करता। समाधि में फोटो नहीं खींचें जाते। अपने आपको जाना जाता है। सुकरात स्वयं को जानने (Know Thyself) की बात करते हैं। समाधि को स्वयं से मिलन की अवस्था कहा जा सकता है। समाधि का अर्थ है – स्वयं में समाधान। जहाँ कोई प्रश्न नहीं, कोई द्वंद्व नहीं। यह कोई हिमालय की गुफा में मिलने वाली अवस्था नहीं है। जब एक किसान अपने खेत में लहलहाती फसल देखकर तृप्त होता है, वह समाधि है। जब एक माँ अपने बच्चे को सुलाकर शांत होती है, वह समाधि है। जहाँ कर्ता और कर्म एक हो जाएँ, वही समाधि है। जब मन-वचन-कर्म का भेद मिट जाय, वह समाधि है। योग के सभी अंग हमें कर्म से दूर जाकर साधना करने को नहीं कहते, अपने समस्त कर्मो को पूर्ण निष्ठा, समर्पण व कुशलता पूर्वक करने का आह्वान करते हैं।
    तभी तो गीता में योगिराज श्रीकृष्ण कहते हैं –
    योग: कर्मसु कौशलम्।
    आधुनिक पाश्चात्य दर्शन के समीक्षावाद के प्रवर्तक दार्शनिक कांट भी कर्तव्य के लिए कर्तव्य करने की बात करते हैं। योग का अर्थ काम से भागना नहीं, काम में कुशलता लाना है। जो काम कुशलता, समता और पूरे मन से किया जाए, वही योग है।
    एक क्लर्क जो फाइल को ईमानदारी से, एकाग्रता से निपटाता है, वह योगी है। एक शिक्षक जो पूरी तैयारी से कक्षा में जाता है, और पूरी, निष्ठा, समर्पण व तन्मयता के शिक्षण करता है, वह योगी है। एक हलवाहा जो पूरे मन से हल चलाता है, वह योगी है। योग हमें संन्यासी नहीं बनाता, योग हमें श्रेष्ठ गृहस्थ बनाता है। योग हमें दुनिया से नहीं भगाता, दुनिया में ठीक से जीना सिखाता है। इसलिए योग को एक घंटे की गतिविधि मत बनाइए, उसे 24 घंटे की जीवन शैली बनाइए। योग को फोटो और वीडियो में नहीं, अपने जीवन में उतारिए। योग मत करिए, जीवन को ही योगमय कर लीजिए।
    यम से समाज सुधारिए, नियम से सुधरे आप।
    आसन से शरीर साधिए, प्राणायाम हरे संताप।
    प्रत्याहार में खुद लौटिए, धारणा मन की माप।
    ध्यान से जीवन कर्म कर, समाधि स्वयं की छाप।
    जीवन ही योग है। योग ही जीवन है।

— डॉ. संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी

डॉ. संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी

जवाहर नवोदय विद्यालय, मुरादाबाद , में प्राचार्य के रूप में कार्यरत। दस पुस्तकें प्रकाशित। rashtrapremi.com, www.rashtrapremi.in मेरी ई-बुक चिंता छोड़ो-सुख से नाता जोड़ो शिक्षक बनें-जग गढ़ें(करियर केन्द्रित मार्गदर्शिका) आधुनिक संदर्भ में(निबन्ध संग्रह) पापा, मैं तुम्हारे पास आऊंगा प्रेरणा से पराजिता तक(कहानी संग्रह) सफ़लता का राज़ समय की एजेंसी दोहा सहस्रावली(1111 दोहे) बता देंगे जमाने को(काव्य संग्रह) मौत से जिजीविषा तक(काव्य संग्रह) समर्पण(काव्य संग्रह)

Leave a Reply