एक चेहरा
रोज़ाना की तरह स्कूल से बच्चों के वापस आने के बाद डाइनिंग टेबल पर सरला अपनी बेटी शिवांगी और बेटा शौर्य के साथ खाने बैठी ही थी कि उसने देखा,….शिवांगी खाना स्वादिष्ट होने की वज़ह से ज़्यादा भोजन लेकर अंततः काफी सारा भोजन बर्बाद भी की। यह देखकर सरला काफी आत्मग्लानि बोध कर रही थी और मन ही मन सोचने लगी,…..” कितने लोगों को खाना नसीब नहीं होता और इधर बच्चे भोजन बर्बाद कर रहे।”
दूसरे दिन, सरला दोनों बच्चों और पति के संग बगल की बस्ती जो कि रेलवे स्टेशन से लगी थी, उसके पास गई। उधर बदबू तो थी ही साथ ही साथ काफी कूड़ा भी था। तभी सहसा उसकी नज़र अति दयनीय दृश्य की ओर पड़ी और उसने अपने बच्चों को भी दिखाया कि किस प्रकार कई अनाथ बच्चे कूड़ा से फेंका हुआ भोजन चुनकर और उठाकर खा रहे थे। अति पीड़ादायक दृश्य को देखकर वह बोल उठी ,…..” हमलोग कितना भोजन बर्बाद करते हैं और ज़िंदगी की यह कड़वी सच्चाई कितनी मार्मिक है।”
उसकी बातें सुनके सभी की आँखें भर आईं और राकेश की आँखें सरला की ओर इशारों में मानो बोल पड़ी ,…..” देश के विकास के साथ यह भी एक कड़वी हकीकत है जो बच्चों को दिखाके अतिरिक्त भोजन लेना और भोजन की बर्बादी,दोनों से परहेज करने की शिक्षा तुम देना चाहती हो।”
दोनों बच्चे घर वापस आकर अत्यंत दुखी एवं उदास थे और ऐसे में राकेश ने बच्चों से कहा,…….” हमलोग कभी-कभी उस बस्ती में जाकर कुछ भोजन सामग्री एवं ज़रूरत की चीजें दे आया करेंगे।” जिसे सुनकर दोनों बच्चे सहमति के रूप में सिर हिलाते हुए मुस्कुराकर पापा के छाती से लिपट गए।
माँ के द्वारा दिखाए गए मार्मिक वास्तविक दृश्य को देखकर दोनों भाई-बहन भोजन अब ज़रूरत के हिसाब से या पहले थोड़ा ही लेते और बर्बादी से बचते थे।
सहसा एक दिन रात्रि के समय शिवांगी भोजन करते हुए बोली ,….” माँ ! जब भी भोजन ज़्यादा लेने की सोचती हूँ तो मुझे कूड़े से खाना खानेवाले बच्चे का …..एक चेहरा स्मरण हो आता है और तुरंत खुद को रोक लेती हूँ कि पहले खा लूँ और ज़रूरत पड़ी तो फिर दोबारा ले लूँगी।”
माँ की आँखें भर आईं और बेटी के सिर पर हाथ फेरते हुए स्वयं से कहने लगी,…. ” इस दुनिया की भीड़ में सिर्फ़ एक चेहरा भी जीवन को सही और गलत की सीख दे सकता है।”
— शावर भकत ‘भवानी’
