कहानी

सरला से मुलाक़ात  

शहर की सुबहें हमेशा भागमभाग वाली होती हैं। ट्रैफ़िक का शोर, हॉर्न की आवाज़ें, और टैक्सी स्टैंड पर भीड़। उसी स्टैंड पर पहली बार उनकी मुलाक़ात हुई। वह ऑफ़िस जा रहा था, बारिश हो रही थी, और टैक्सी का इंतज़ार लंबा खिंच रहा था। उसने देखा, एक लड़की सादा सलवार सूट में, बाल ज़ुल्फ़ों की तरह बिख़रे,चेहरे को चूम  रहे थे,साइड में कन्धे पर बेग था,  जिनमें से कुछ बुक्स ओर फ़ाइल्स झांक रही थीं, उसे भी शायद  कहीं  जाना था,वो भी इंतज़ार कर रही थी। 

“कितनी बार ऐसा होता है न, टैक्सी के चक्कर में घंटा निकल जाता है,” उसने हँसते हुए कहा। वह मुस्कुराई, “हाँ, और तब छोटी-छोटी बातें ही सहारा बन जाती हैं। आप रोज़ कहाँ जाते हैं?” बातें बढ़ीं,ऑफ़िस की थकान, शहर की भागदौड़, चाय की चुस्कियों पर ज़िंदगी के फ़लसफ़े। अगले दिन फ़िर वही स्टैंड। इस बार उसने चाय का गिलास थमा दिया। “पी लो, इंतज़ार आसान हो जाएगा।” वह मुस्कुराई ,हँसी,  ऐसे ही लम्हे जुड़े। जुड़ते चले गए और दोनों तरफ दिलों के दरवाज़े  खुलते चले गए,कभी टैक्सी में साथ बैठना, कभी बारिश में भीगना। लगाव  बढ़ा  बेचैनियां  बढ़ीं,बिना नाम लिए , खामोशी के साथ। वक्त की पाबंदियां  भी दिखने लगीं ,इंतेज़ार में सरला  भी ओर अमित की  निगाहें भी,बेचैन से इधर उधर  देखती को च तलाश करती रहतीं,अपना-पन, जैसे सालों पुरानी दोस्ती हो।

उसके नाम  सरला था। नाम पूछा तो बोली, “बस  सरला ही कह लो।” वह राज़ रखता रहा अमित। चैट्स शुरू हुईं रातों में। “कल मिलते हैं?” “हाँ, स्टैंड पर।” कई दिनों तक  मिलना होता रहा आना जाना, लेकिन एक दिन, टैक्सी आ गई, वह चढ़ गई,  दूसरी तरफ़ और बस… चली गई। कोई इशारा नहीं, कोई नज़र नहीं। अमित स्टैंड पर खड़ा रहा, सोचा शायद कल।

कल आया, पर  सरला नहीं आई। चैट का कोई जवाब नहीं। फ़ोन की घंटी बजने का इंतज़ार। दिन बीते, हफ़्ते। अमित रोज़ स्टैंड जाता, चाय पीता, इंतज़ार करता। शहर की भागदौड़ में उसका दिल अटका रह गया। कभी लगता, शायद बिज़ी है। शायद कोई उलझन। लेकिन ख़ामोशी गहरी होती गई। कोई झगड़ा नहीं, कोई शिकायत नहीं। बस, सरला   ,सरला और सरला का इंतेज़ार, एक शाम, पुरानी चैट्स स्क्रॉल करते हुए आँसू आ गए। आख़िरी मैसेज उसका था,”कल मिलते हैं।” कोई कल न आया। अमित ने क़लम उठाई, एक ख़त लिखा। बिना पते का।

सुनो न सरला

आज फ़िर स्टैंड गया था। तुम्हारी चाय का गिलास खाली था। तुम्हारी हँसी का इंतज़ार अब आदत बन गया है। तुम बिना अलविदा कहे चली गईं, पर मेरे सफ़र के पन्ने अधूरे हैं। कौन सा लम्हा था जब तुमने रास्ता बदल लिया? और  क्यों क्या ख़ता हो गई मुझसे, बता तो देतीं तुम, मैं आज भी सोचता हूं,क्या वो टैक्सी वाला दिन आख़िरी था? हर  टैक्सी में तुम्हारा चेहरा ढूंढता फिरता हूँ, वज़न काफ़ी कम हो गया है,

लोग कहते हैं जुदाई में हौसला चाहिए। तुम्हें तो था, मुझे इंतज़ार की आदत। खुश रहना, जहाँ भी हो। क्योंकि तुमने अलविदा न कहा, इसलिए मेरे दिल में तुम आज भी हो।

सिर्फ़ तुम्हारा, वादा करता हूं खुद से क़सम खाता हूं,।एरी ज़िंदगी का इंतेज़ार तुम थीं और तुम ही रहेगी, सारी ज़िंदगी इंतेज़ार में ही गुज़रेगी चाहे किसी तरह भी गुज़रे ,

उफ़ मेरे मालिक  ये इंतज़ार क्या  कभी न ख़त्म होगा,अमित ने

ख़त मोड़ा, जेब में रखा। भेजा नहीं। शहर की रातें अब ख़ामोश थीं। स्टैंड पर अब भी जाता है अमित, चाय पीता है। खामोश सा उसकी निगाहे  एक जगह नहीं ठहरती  ढूंढती रहती हैं सरला को,शायद कभी  लौट आए। या शायद ये कहानी ऐसे ही अधूरी रहे। बिना अलविदा के।

कल आया और कई कल भी आए, मगर उदास से, पर सरला नज़र नहीं। आज तक चैट का कोई जवाब नहीं। फ़ोन की घंटी बजने का इंतज़ार। दिन बीते, और  साल बन गए,अमित ने नौकरी बदली,  बी. एड. कॉलेज में लेक्चरर बन गया। सरला का चेहरा यादों में रह गया। स्टैंड अब भी जाता कभी-कभी, लेकिन अब अपनी कार से। इंतज़ार की आदत बनी रही।

चार साल बाद, एक शाम कॉलेज के कॉरिडोर में। अमित क्लास से निकला तो सामने सरला अब इसी कॉलेज में नई लेक्चरर,साथी लोगों ने बताया था कोई नई टीचर आने वाली है,। आँखें मिलीं, दुनिया रुक गई। “सरला?” “अमित… तुम?” हँसी फूटी मुस्कुराहटें जागीं, पुरानी यादें उमड़ आईं। पता चला, उसने बताया वो भी ,  बी. एड ही कर रही थी, घर की ज़िम्मेदारियाँ आईं तो चली गई बिना बताए। “माफ़ी माँगती हूँ, डर लगता था कहने से।”  वक्त नहीं था बच्चों की  ट्यूशन,अमित मुस्कुराया, “इंतज़ार  मेरा था  था कि नहीं, उसने चेहरा झुकाया फिर अमित की तरफ़ देखा शरारत से देखा,अब जुदाई नहीं थी। दोनों की नौकरी एक ही कॉलेज में। टैक्सी की यादें हँसी में बदल गईं।  दोनों की मुहब्बत शादी के इक़रार में बदली , कुछ दिनों बाद वो जीवन साथ बन गए थे। उनकी अपनी कार है, उनका अपना छोटा सा घर है। शामें हैं घर की खुली छत पर। खुला आसमान ऊपर, चाँद मुस्कुराता हुआ। सरला चाय बनाती, अमित पुरानी चैट्स दिखाता। सपने पूरे हो  रहे थे,शादी  के बाद, भविष्य के प्लान। चाँदनी रातें खुशनुमा, हवा में उनके हँसने की आवाज़।

शाम छत पर, चाँदनी बरस रही थी।  “अब अलविदा नहीं, अमित। ये सफ़र हमारा है।”

— डॉ मुश्ताक अहमद शाह 

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।