कविता

बिना हंसे भी जी लूंगा

हां हूं बड़ा भाई सब कुछ सहूंगा,
निकाल दोगे घर से अकेला रहूंगा,
नहीं भूला हूं बचपन तुझे गोद उठाया हूं,
जब भी तू रोता था सीने से लगाया हूं,

उंगली पकड़ पीछे पीछे मेरे तू आता था,
अपना हिस्सा खा मेरा हिस्सा भी खाता था,
पता नहीं कंधों पर कितनी बार बिठाया है,
हाथों का दर्द भुला झूला झुलाया है,

घर के कोने में बैठ तुझे पढ़ाता था,
हाथ पकड़ कर तुझको स्कूल ले जाता था,
बहाने देख तुम्हारे घर में बिठाता था,
भोर अंधेरी रहती थी तब काम पे जाता था,

दिन भर थकता काम से मैं
और रात में आता था,
सबके चेहरे मुस्कान देख
मैं खुश हो सो जाता था,

तुझे अपने पांव खड़ा करने जब खेत मैं बेचा था,
चुपके से उसका पैसा तू जुए में फेंका था,
अपने बच्चों के खातिर कपड़ा मैं नहीं ला पाता था,
उसी शाम अपने बच्चे को तू नए ड्रेस दिलाता था,

पर तूने खुद को छीना मुझसे और
सारे रिश्ते नाते छीन डाले हो,
थी तेरी गलती पर मुझे घर से निकाले हो,

तुझे मुबारक़ मां बहन व रिश्ते
मेरा क्या मैं जी लूंगा,
पीने की आदत है पहले से
फिर से आंसू पी लूंगा,

जिये शान से बच्चे तुम्हारे बद्दुआ नहीं मैं तुझे दूंगा,
हंसना अब तो मैं भूल चुका हूं बिना हंसे भी जी लूंगा।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554